बुलंदशहर में चाय पर चर्चा करते लोग।
- फोटो : अमर उजाला
11 नवंबर को 'सत्ता का संग्राम' कार्यक्रम की शुरुआत गाजियाबाद से हुई। यहां से अमरोहा, मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, बदायूं, पीलीभीत, शाहजहांपुर, लखीमपुर खीरी, सीतापुर,हरदोई, फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा, मैनपुरी, एटा, फिरोजाबाद, आगरा, मथुरा, हाथरस, अलीगढ़ होते हुए कार्यक्रम का पहला चरण बुलंदशहर में समाप्त हुआ। इन सभी 22 जिलों में अलग-अलग वर्ग के लोगों से बात हुई। शुरुआत चाय पर चर्चा से की गई। इसमें हर वर्ग, हर क्षेत्र, हर धर्म और हर जाति के लोगों ने शिरकत की।
कौन सा दल यहां कितना मजबूत है?
इन 22 जिलों में कुल 129 विधानसभा सीटें हैं। गाजियाबाद में पांच, अमरोहा में चार, रामपुर में पांच, बरेली में नौ, बदायूं में सात, पीलीभीत में सात, शाहजहांपुर में छह, लखीमपुर खीरी में आठ, सीतापुर में नौ, हरदोई में आठ, फर्रुखाबाद में चार, कन्नौज, इटावा में तीन-तीन, मैनपुरी और एटा में चार-चार, फिरोजाबाद में पांच, आगरा में नौ, मथुरा में पांच, हाथरस में तीन, अलीगढ़ में सात और बुलंदशहर में सात विधानसभा सीटें हैं। अब राजनीतिक पकड़ की बात करें तो इन 122 सीटों में सबसे ज्यादा 109 पर भारतीय जनता पार्टी का कब्जा है। 18 सीटों पर सपा और दो पर बसपा के विधायक हैं।
स्थानीय लोगों से चाय पर चर्चा के दौरान इन सभी 22 में महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा हावी रहा। इसके अलावा 18 जिलों में खराब सड़कों को लेकर लोगों की नाराजगी दिखी। ज्यादातर लोगों ने सरकार के ओवरऑल कामकाज से तो खुशी जाहिर की, लेकिन इन मुद्दों पर सरकार को जल्द से जल्द सुधार लाने के लिए कहा।
खराब सड़कों को लेकर लोगों का ये भी मानना है कि पहले के मुकाबले सड़कें भी बेहतर हुई हैं, लेकिन उतनी नहीं जितनी उम्मीद थी। लोगों का ये भी कहना है कि हाईवे और पुलों का निर्माण भी अच्छा हुआ है। हाईवे की सड़कें काफी बेहतर हैं, लेकिन शहर या नगर के अंदर की सड़कें काफी तकलीफ देती हैं। कुछ जिलों में सीवर, पानी की पाइप लाइन डालने के लिए सड़कों की खुदाई हुई है।
- इन जिलों में लोगों ने कहा- सड़कें खराब हैं, लेकिन पहले के मुकाबले ठीक हैं
गाजियाबाद, बदायूं, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, हरदोई, फर्रुखाबाद, कन्नौज, इटावा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, आगरा, मथुरा और हाथरस में 237 लोगों से तमाम मुद्दों पर बात की गई। इनमें से ज्यादातर ने अपने-अपने जिलों में सड़कों की स्थिति के बारे में बताया। कहा कि अभी भी जगह-जगह गड्डे हैं। आम लोगों को काफी परेशानी होती है। हालांकि, लोगों ने ये भी बताया कि अगर पहले के मुकाबले सड़कों की तुलना की जाए तो थोड़ा सुधार जरूर हुआ है। लोगों का कहना है कि सड़कें बनती तो हैं, लेकिन इसमें प्रयोग में लाए जाने वाले मटेरियल की क्वालिटी खराब होती है। इसके चलते एक ही बारिश में फिर से सड़कें टूट जाती हैं और जगह-जगह गड्डे हो जाते हैं। सरकार को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
- इन जिलों में विकास कार्यों के लिए खुदी सड़कें
एटा, बरेली और अलीगढ़ के लोग भी सड़कों को लेकर काफी परेशान दिखे। लोगों ने कहा कि जगह-जगह सड़कें खुदी पड़ी हैं। वह भी लंबे समय से। कहीं सीवर का तो कहीं पानी की पाइप लाइन पड़ रही है। लोगों का कहना है कि पिछले दो से तीन साल से ये सड़कें इसी तरह खुदी पड़ी हैं। तय समय में विकास कार्य नहीं होते हैं। इसकी वजह से आम लोगों को तमाम तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बारिश में इन गड्डों में पानी भर जाता है। कई एक्सीडेंट हो चुके हैं।
- इन जिलों में लोगों ने कहा- सड़कें ठीक हुई हैं
अमरोहा, रामपुर, शाहजहांपुर, सीतापुर और बुलंदशहर के लोगों ने सड़कों को लेकर कुछ खास नाराजगी नहीं जाहिर की। कहा कि पहले के मुकाबले सड़कें अब काफी बेहतर हुई हैं। जहां, ट्रैफिक की समस्या होती थी, आज वहां ओवर ब्रिज बन चुका है।
हाथरस में चाय पर चर्चा करते लोग।
- फोटो : अमर उजाला
लोगों ने युवाओं, महिलाओं के रोजगार का मुद्दा उठाया। कहा कि सरकार को स्थानीय स्तर पर प्रत्येक जिलों में कोई न कोई इंडस्ट्री सेट करनी चाहिए, जिससे यहां के लोगों को रोजगार मिल सके। इसके अलावा सरकारी भर्तियों को भी नियमित करने की मांग उठी। ज्यादातर युवाओं का कहना है कि सरकारी भर्तियां दो से तीन साल बाद निकलती हैं। ऐसे में कई युवाओं की उम्र निकल जाती है। सरकार को इसपर ध्यान देने की जरूरत है। हालांकि, कुछ लोगों ने स्वरोजगार को लेकर चलाई जा रही योजनाओं के बारे में भी कहा। बताया कि बड़ी संख्या में महिलाएं और युवा स्वरोजगार की तरफ भी बढ़ रहे हैं।
इसी तरह महंगाई का भी मुद्दा उठा। इसको लेकर दो-चार लोगों को छोड़कर सबकी राय एकमत दिखी। लोगों ने कहा कि पेट्रोल-डीजल, सब्जियां, गैस सिलेंडर सबकुछ महंगा हो गया है। ऐसे में घर चलाना मुश्किल होने लगा है। हालांकि, लोगों का ये भी मानना है कि सरकार ने गरीबों के लिए काफी कुछ किया है। मुफ्त राशन व अन्य कई सुविधाएं मुहैया कराई हैं, लेकिन मध्यमवर्गीय लोग परेशान हैं।