गोरखपुर। छुट्टा पशुओं को पकड़ने के नाम पर नगर निगम प्रत्येक माह एक लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर रहा है। पशु तो पकड़े नहीं जा रहे हैं, लेकिन हरेक माह कर्मचारियों को भुगतान किया जा रहा है। स्थिति यह है कि फर्टिलाइजर फैक्टरी कैंपस में बना पशुबाड़ा खाली है।
शहर की सड़कों, गलियों में छुट्टा पशु नजर आते हैं। शहर में घूम रहे इन पशुओं को पकड़ने के लिए स्वयंसेवी संस्था प्रकाश ग्रामीण सेवा समिति की ओर से उपलब्ध कराए गए 15 कर्मचारियों को नगर निगम ने रखा है। प्रत्येक कर्मचारी को प्रत्येक दिन 250 रुपये दैनिक भत्ता दिया जाता है। लिहाजा नगर निगम इन कर्मचारियों को हरेक माह तकरीबन 1.12 लाख रुपये भुगतान कर रहा है। इसके बावजूद शहर के सभी इलाकों में छुट्टा पशु घूम रहे है। यही पशु जाम की वजह भी बन रहे हैं। ये कर्मचारियों से पशु पकड़े नहीं जा रहे हैं। इस वजह से इन कर्मचारियों से नाले में गिरे पशुओं को निकालने या बैनर पोस्टर हटाने का काम लिया जा रहा है।
पशुबाड़े में नहीं रखे जा रहे हैं पशु
इस वर्ष के शुरुआती महीने में छुट्टा पशुओं के हमले से कई लोग घायल हो गए थे। इसके बाद छुट्टा पशुओं को पकड़कर पशुबाड़े में रखा जाने लगा। 100 से ज्यादा पशुओं को यहां रखा गया। इनमें से अधिकांश संख्या सांड़ों की थी। लेकिन यहां बंद छुट्टा पशुओं की तबीयत बिगड़ने के बाद उन्हें धीरे धीरे करके छोड़ दिया गया। फिलहाल पशुबाड़े में एक भी पशु नहीं है।
जमीन नहीं मिलने से अटका हुआ है ‘पशुबाड़ा’
नगर निगम कार्यकारिणी और सदन ने इस समस्या से निजात दिलाने के लिए शहर में पशुबाड़े की जमीन तलाशी, लेकिन चारागाह की जमीन और नगर निगम क्षेत्र के बाहर होने की वजह से यह जमीन नगर निगम को नहीं मिल सकी। लिहाजा आने वाले कुछ समय तक पशुबाड़ा बनाए जाने की कोई संभावना नहीं दिख रही।
- एक स्वयंसेवी के माध्यम से रखे इन कर्मचारियों पर नगर निगम को हरेक महीने एक लाख रुपये से ज्यादा खर्च करना पड़ता है। फिलहाल पशुओं को पकड़ने का काम नहीं होने के बावजूद इन कर्मचारियों को रखना हमारे लिए जरूरी है। क्योंकि आए दिन पशुओं के नाले में गिरने की घटना होती हैं। ये कर्मचारी पशुओं को पकड़ने और कहीं फंसे होने पर निकालने में एक्सपर्ट हैं। पशुबाड़े की जमीन को लेकर भी कई तरह की तकनीकी दिक्कत होने की वजह से पशुबाड़ा का निर्माण संभव नहीं हो पा रहा है।
डॉ. अरुण कुमार, मुख्य नगर स्वास्थ्य अधिकारी, नगर निगम