बाप-बेटे में चल रहे दंगल के बीच पार्टी के दो फाड़ हो जाने से यूं तो हर सपाई अवाक है मगर सर्वाधिक परेशान प्रत्याशी और पदाधिकारी हैं। प्रचार-प्रसार भूल अब ये उम्मीदवार पार्टी में अपने-अपने सूत्रों से ये तस्दीक करने में जुटे हैं कि वे प्रत्याशी भी हैं कि नहीं।
विशेषकर उन दो विधानसभाओं में जहां चाचा के साथ भतीजे के भी अलग-अलग प्रत्याशी हो गए हैं। इन सीटों में चौरीचौरा से सीएम की तरफ से घोषित उम्मीदवार और पूर्व महासचिव मनुरोजन यादव और बांसगांव से शारदा देवी लखनऊ में ही जमी हैं। मंगलवार को इनके जिले में वापसी की सूचना है। इसके बाद इन दोनों विधानसभा क्षेत्र में शिवपाल के प्रत्याशी निकलते हैं या अखिलेश के। या फिर दोनों के, यह सवाल न केवल क्षेत्र के लोगों बल्कि पार्टी में भी चर्चा का विषय बना हुआ है।
जिला और महानगर अध्यक्ष समेत कई पदाधिकारियों की तैनाती शिवपाल ने की थी। ऐसे में पार्टी में शिवपाल का मौजूदा हश्र देख इन पदाधिकारियों को भी अपनी कुर्सी छिनने का भय सताने लगा है। पार्टी के कुछ नेता तो इनकी भी नई सूची तैयार होने का दावा कर रहे हैं। इस दावे में कोई दम है या फिर सिर्फ शिगूफा, यह भी आने वाला समय ही बताएगा, मगर यह तो सच है कि सियासत के इस अंजाम को देख प्रत्याशियों के साथ ही इन पदाधिकारियों के माथे पर भी चिंता की लकीरें दिखाई पड़ने लगी हैं।
कुछ दिन पहले मुख्यमंत्री अखिलेश ने जिले की नौ विधानसभा में सात के उन प्रत्याशियों पर ही अपनी भी मोहर लगाई जिनकी घोषणा शिवपाल ने की थी, मगर रविवार को हुए अधिवेशन के बाद स्थिति अब बदल गई है। सिंबल के बंटवारे तक पहुंच चुक ा बाप-बेटे का विरोध, ऊपर स्तर पर शुरू हुए बदलाव का क्रम नीचे तक जारी रहने का संकेत दे रहा है। यही वजह है कि पिपराइच से दो बार विधायक रह चुकीं राजमति निषाद को और छोड़ दें तो बाकी की छह सीटों के प्रत्याशियों को भी अपने वजूद की चिंता सताने लगी है। एक-एक सीट के लिए 20 लोगों की दावेदारी के बीच कहीं कोई मुख्यमंत्री का भरोसा न कायम कर ले, हर कोई इसे लेकर कशमकश में है।