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बोले वक्ता, विश्व में सर्वाधिक अध्ययन गुरु गोरक्षनाथ पर

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बोले वक्ता, विश्व में सर्वाधिक अध्ययन गुरु गोरक्षनाथ पर
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गोरखपुर। गुरु गोरक्षनाथ की धरती पर नाथपंथ के विश्वकोश निर्माण की योजना बनाने के लिए देश भर से विद्वान जुटे हैं। रविवार को उन्होंने अपने शोध और जुटाई शब्दालियों पर चर्चा की। नाथपंथ पर शोध करने वाले 30 विद्वानों ने अपने शोधपत्र पढ़े। इसे आधार बनाते हुए अब विश्वकोश तैयार किया जाएगा। विद्वानों ने यह प्रमाणित किया कि विश्व के सभी विश्वविद्यालयों में स्थापित भारतीय अध्ययन केंद्रों में महायोगी गुरु गोरक्षनाथ पर सबसे ज्यादा अध्ययन हुआ है।
महायोगी गुरु गोरक्षनाथ शोधपीठ, दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय की ओर से राष्ट्रीय संगोष्ठी का शनिवार को समापन सत्र हुआ। इसका विषय ‘नाथपंथ विश्वकोश निर्माण: योजना एवं क्रियान्वयन के विविध आयाम’ रखा गया था। मुख्य अतिथि शिलांग विश्वविद्यालय के प्रोफेसर मानेंद्र सिंह ने कहा कि जीवन में भय का सबसे बड़ा कारण मृत्यु है। नाथ पंथ में जो कुंडलिनी जागरण, ध्यान, समाधि का प्रावधान है उसे इस मृत्यु भाव के आलोक में देखना चाहिए।
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गोरखनाथ लोक जीवन में भय को ही दूर करने का काम कर रहे थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता पूर्वांचल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रोफेसर यूपी सिंह ने की। कहा कि विश्व में तमाम ऐसे देश हैं जो मुख्य रूप से इस्लामिक है लेकिन नाथपंथ एक ऐसा संप्रदाय रहा है जो इन देशों में भी सम्मानजनक स्थितियों में रहा है। हर जाति, धर्म में जन्मा हुआ व्यक्ति नाथपंथ के अनुयायी के क्रम में पाया जाता है। नाथपंथ का बंधुत्व व प्रेम आज तक जीवित है।
प्रो सिंह ने कहा कि गुरु गोरखनाथ मंदिर बंधुत्व की बात करता है। महंत अवेद्यनाथ ने वाराणसी के डोम राजा के घर भोजन करके और गोरखपुर में मंगला माता मंदिर के पास कुष्ठ रोगियों के पढ़ने की व्यवस्था कराकर समाज व राष्ट्र को एक बड़ा संदेश दिया। कार्यक्रम का संचालन डॉ तूलिका मिश्रा ने किया। इस अवसर पर प्रो विनोद कुमार सिंह, प्रो.विनय सिंह, प्रो रामदरश राय, डॉ अमित कुमार उपाध्याय, डॉ विनीता सिंह आदि मौजूद रहे।
100 से ज्यादा शब्दों का संकलन
गोरखपुर। कार्यक्रम आयोजक और शोधपीठ के विशेष कार्याधिकारी प्रो रविशंकर सिंह ने बताया कि संगोष्ठी में विद्वानों ने नाथपंथ के 100 से ज्यादा शब्दों को संकलित किया है। अवधूत, आदेश जैसे शब्द इसमें आए। इनकी व्याख्या की गई। उन्होंने बताया कि विभिन्न भाषाओं में साहित्य का अध्ययन कर शब्द संकलित किया जाएगा।
गोरखनाथ के चलते ही संत परंपरा का विस्तार मिला
गोरखपुर। संगोष्ठी में तकनीकी क्षेत्र में महाराष्ट्र के डॉ एसके जोगी ने विशिष्ट व्याख्यान में कहा कि यूनेस्को ने कुंभ मेले को दुनिया की धरोहर के लिए चुना। कुंभ मेला नाथ संप्रदाय से संबंधित है। डॉ जोगी ने कहा कि गोरखनाथ नहीं होते तो संतों की जो परंपरा हमें आज देखने को मिलती है, वह नहीं मिलती। महाराष्ट्र में मराठी साहित्य के पहले कवि पुरेंदर भी नाथ संप्रदाय में विश्वास रखने वाले थे। मराठी संत में परंपरा की शुरुआत ज्ञानेश्वर से जानी जाती है। वह भी नाथ पंथ में आस्था रखने वाले संत थे।
वाराणसी के डॉ विजयेंद्र पांडेय ने कहा कि गुरु गोरखनाथ ने योग परंपरा को क्या दिया है, वह आज समझ में आता है। नाथ संप्रदाय की जड़ें लोक परंपरा में गहरी है। ऐसे में नाथ संप्रदाय की व्यापकता को समझने के लिए लोक परंपरा का अवगाहन करना पड़ेगा। डॉ नारायण हलदर ने कहा कि नाथपंथ की शुरुआत 10 वीं शताब्दी में बंगाल में हुआ।
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बंगाल बहुधार्मिक राज्य है। बंगाल में भी नाथपंथ के नौ मंदिर हैं। प्रो राजवंत राव ने कहा कि नाथपंथ का सबसे बड़ा योगदान जातिविहीन समाज की रचना है। इस पंथ के साधु संतों ने सबसे बड़ा काम सोशल मोबिलिटी का किया, जिसमें जाति, धर्म व पाखंड की सीमाएं टूट गई।
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