शनिवार को मेडिकल कॉलेज में साइटोकॉन 2016 का आयोजन हुआ। इसमें देश के विभिन्न जगहों से आए विशेषज्ञों ने विचार रखे। इस दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि समय से कैंसर की पहचान होने से ही उसका सटीक इलाज संभव हो पाता है। इसकी जांच के लिए बायोप्सी एक पुरानी पद्धति हो चुकी है। अब साइटोलॉजी (कोशिका विज्ञान) के जरिए कैंसर की सटीक जांच हो जाती है और रिपोर्ट आने में भी महज आधे घंटे लगते हैं।
इसके पूर्व कार्यक्रम का उद्घाटन मुख्यमंत्री के खेल सलाहकार डॉ. अनुराग भदौरिया व डॉ. पूर्णिमा शुक्ला ने किया। मेडिकल कॉलेज में पहली बार हुए राष्ट्रीय स्तर के साइटोकॉन 2016 का आयोजन साइटोलॉजी एसोसिएशन ऑफ यूपी चैप्टर द्वारा किया गया है। उद्घाटन सत्र में प्राचार्य प्रो. राजीव मिश्रा ने कहा कि साइटोलॉजी से कैंसर की पहचान बहुत ही आसान होती है। जांच के लिए अंग के टुकड़े की जरूरत नहीं होती, बल्कि एक इंजेक्शन से ही सैंपल निकाला जाता है और उसी से कोशिकाओं की जांच कर रिपोर्ट तैयार की जाती है। इस मौके पर 45 जूनियर डॉक्टरों ने पोस्टर प्रतियोगिता में हिस्सा लिया, जबकि 22 ने पेपर प्रस्तुत किया।
राम मनोहर लोहिया संस्थान के पैथोलॉजी विभाग की अध्यक्ष डॉ. नुजहत हुसैन ने फेफड़े में होने वाले कैंसर पर व्याख्यान दिया। उन्होंने कहा कि फेफड़े के कैंसर की पहचान के लिए साइटोलॉजी एक सटीक जांच है। अलग-अलग मरीज में कैंसर के प्रकार भी अलग-अलग होते है। नई तकनीक में फेफड़े के कैंसर की पहचान के लिए एक इंजेक्शन से ही जांच कर ली जा रही है। केजीएमयू के पैथोलॉजी विभाग की डॉ. मधुमति गोयल ने बताया कि बच्चों के गले में संक्रमण से गांठ बन जाती है। इसमें कैंसर के लक्षण हो सकते हैं। लेकिन हर दस में से छह गांठ में टीबी के लक्षण भी मिलते हैं जबकि 20 फीसदी में कैंसर के। शेष 20 फीसदी में मवाद या मांस मिलता है। छोटे गांठ में कैंसर की आशंका ज्यादा होती है।
कोलकाता मेडिकल कॉलेज के पैथोलॉजी विभाग के डॉ. अस्तोबा मंडल ने बताया कि महिलाओं में स्तन कैंसर एक आम समस्या है। इसकी शुरूआत स्तन में गांठ से होती है। अब तक हम जांच के लिए सुई से गांठ के अंदर का मवाद निकालकर उसकी मार्कफालोजी जांच करते थे। मगर अब एंटीबॉडी स्क्रीनिंग कर यह पता कर सकते हैं कि कैंसर किस प्रकार का है। आगरा मेडिकल कॉलेज की डॉ. कुसुम वर्मा ने बताया कि लीवर, फेफड़े या आंतों में होने वाले कैंसर के लिए अब ब्रश तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है। यह काफी सुरक्षित प्रक्रिया है। आम तौर पर पेट या फेफ ड़े में इंजेक्शन आदि से खतरा बढ़ जाता है। इससे बचाने के लिए इंडोस्कोप की मदद से ब्रश डाला जाता है और इसी से जांच हो जाती है।