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ब्लैक कार्बन पर इसरो की चिंता गोरखपुर पहुंची

Wed, 04 May 2016 08:02 PM IST
डॉ. राकेश राय, अमर उजाला, गोरखपुर।
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गोरखपुर यूनिवर्सिटी
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वातावरण में बढ़ रही ब्लैक कार्बन की मात्रा को लेकर इंडियन स्पेस रिसर्च आर्गेनाइजेशन (इसरो) की चिंता गोरखपुर तक पहुंच गई है। इसरो ने गोरखपुर यूनिवर्सिटी के भौतिक विज्ञान विभाग को इसे मापने की जिम्मेदारी सौंपी है। विभाग के केंद्र में इसे मापने के लिए लगे एथेलोमीटर ने सीजनवार वातावरण में ब्लैक कार्बन की मात्रा मापनी शुरू कर दी है। इसरो के निर्देश के मुताबिक हर महीने दर्ज हो रहे आंकड़े विभाग की ओर से उसके मुख्यालय त्रिवेंद्रम में उपलब्ध कराए जा रहे हैं।
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प्रिंसिपल इन्वेस्टिगेटर और विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शांतनु रस्तोगी ने बताया कि गोरखपुर क्षेत्र इसरो के इंडो गैजेटिक प्लेन के दायरे में आता है, जहां उद्योगों की वजह से ब्लैक कार्बन की मात्र ज्यादा होने की आशंका है। ऐसे में इसरो ने इस क्षेत्र में ब्लैक कार्बन की मात्रा जानने के लिए गोरखपुर यूनिवर्सिटी के भौतिक विज्ञान विभाग को चुना है।

विभाग में लगा एथेलोमीटर दिन-रात वातावरण में मौजूद ब्लैक कार्बन को माप रहा है। अब तक के आंकड़ों के मुताबिक जाड़े का मौसम यहां के वातावरण में ब्लैक कार्बन के लिए ज्यादा मुफीद है, जब इसकी मात्रा 30 से 40 हजार नैनोग्राम पर मीटर क्यूब दर्ज की गई है। गर्मी में यही मात्रा 1500 के करीब पहुंच जाती है, जबकि बरसात में यह एक हजार से नीचेे चली जाती है। यही नहीं, रात और दिन के ब्लैक कार्बन की मात्रा में खासा अंतर रहता है।
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डॉ. रस्तोगी ने बताया कि फिलहाल हर महीने दर्ज आंकड़ा इसरो को भेजा जा रहा है। इसके अलावा विभाग भी इसे लेकर गंभीर अध्ययन कर रहा है, लेकिन किसी भी विश्लेषणात्मक निर्णय पर पहुंचने में अभी लंबा वक्त लगेगा। कम से कम पांच वर्ष के आकलन के बाद भी किसी निर्णय पर पहुंचा जा सकता है। जहां तक वातावरण में ब्लैक कार्बन की मौजूदगी के मानक का सवाल है तो इसे लेकर अनवरत शोध कार्य चल रहा है। ब्लैक कार्बन की दखल ने बदला मौसम का मिजाज पर्यावरणविद् डॉ. गोविंद पांडेय के मुताबिक वातावरण में ब्लैक कार्बन की दखल ने पिछले कुछ दशकों से मौसम का मिजाज बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कार्बन के अपूर्ण दहन से उपजे ब्लैक कार्बन में उष्मा का अत्यधिक अवशोषण होता है। ऐसे में वह सूर्य की उष्मा के अवशोषित ग्लोबल वार्मिंग बढ़ने की वजह भी बन रहा है। ग्लेशियर पर जमा ब्लैक कार्बन सूर्य की उष्मा को अवशोषित कर उसे लगातार गला रहा है। इसके अलावा बेमौसम बारिश में भी ब्लैक कार्बन की भूमिका है। यह बारिश के लिए बनने वाले बादलों के लिए अणु का काम करता है। ब्लैक कार्बन की बढ़ी मात्रा ने बारिश के मौसम के मानक बदलने में भी भूमिका निभाई है। 
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