मेडिकल कॉलेज में हीमोफीलिया के इंजेक्शन खत्म होने से मरीजों की जान खतरे में पड़ गई है। जिला अस्पताल में भी इस बीमारी के इलाज के इंतजाम नहीं होने से मरीजों की मुश्किलें ज्यादा बढ़ गई हैं। कॉलेज प्रशासन ने इसके लिए शासन को पत्र लिखा है, मगर एक महीना बीतने को है, इंजेक्शन अभी तक नहीं आ सका है।
बीमारी की गंभीरता के आधार पर रोगी को तीन श्रेणियों में बांटा गया है, जिसे फैक्टर 7, फैक्टर 8 और फैक्टर 9 के नाम से जाना जाता है। मेडिकल कॉलेज में इस बीमारी के कुल 196 मरीज रजिस्टर्ड हैं, जिसमें फैक्टर 7 के 3, फैक्टर 8 के 171 और फैक्टर 9 के 22 मरीज हैं। तीनों श्रेणियों के इंजेक्शन कम होने पर ही कॉलेज प्रशासन ने शासन को पत्र लिखा था। अब महज फैक्टर 9 के ही 13 वॉयल बचे हैं, बाकी दोनों श्रेणियों के इंजेक्शन तीन हफ्ते पहले ही 29 मई को खत्म हो चुके हैं।
बाल रोग विभाग ने पत्र लिखकर महानिदेशक से इंजेक्शन की मांग की, मगर अभी तक दवा नहीं आ सकी है। डॉक्टर बताते हैं कि इस बीमारी में रक्तस्राव होने की दशा में दिक्कत बढ़ जाती है और अधिक रक्तस्राव होने पर मरीज की जान भी जा सकती हैं। इतनी गंभीर बीमारी के इलाज के लिए प्राइवेट अस्पतालों में भी सुविधा कम है। कुछ बड़े प्राइवेट अस्पताल इसका इलाज करते हैं, मगर इसके लिए वहां लाखों खर्च करने पड़ते है।
क्या है हीमोफीलिया
यह एक आनुवंशिक बीमारी है। इसमें खून का थक्का नहीं जमता। रोगी को चोट लगने पर शुरू हुआ रक्तस्राव बंद ही नहीं हो पाता। सबसे ज्यादा खतरा अंदरूनी चोट लगने पर होता है। इसीलिए इस बीमारी के मरीजों को रजिस्ट्रर्ड किया जाता है और नियमित रूप से उनका फॉलोअप किया जाता हैं। क्योंकि अधिक रक्तस्राव होने से मरीज की जान जा सकती है।
दवा के लिए महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा को पत्र लिखा जा चुका है। उम्मीद है कि जल्द ही दवाएं आ जाएंगी।
- डॉ. एसके श्रीवास्तव, विभागाध्यक्ष, बाल रोग विभाग