बिना एनओसी बीएड की मान्यता हासिल करने का 29 कॉलेजों का प्रकरण एक बार फिर एनसीटीई के पाले मेें है। गोरखपुर यूनिवर्सिटी ने उन सभी 11 कॉलेजों का दस्तावेज एनसीटीई से मांगा है, जिन्होंने अपने पक्ष में हाईकोर्ट का आदेश यूनिवर्सिटी को रिसीव कराया था। दस्तावेज मांगने की वजह कॉलेजों की ओर से प्रस्तुत मान्यता के कागजात का एनसीटीई के दस्तावेज से मिलान करना है।
यूनिवर्सिटी ने ऐसे सभी 11 कॉलेजों से नौ जुलाई तक मान्यता से जुड़े कागजात प्रस्तुत करने को कहा था, जिन्होंने हाईकोर्ट में यह दलील दी थी कि उन्होंने 2009 के एनसीटीई एक्ट के तहत मान्यता के लिए आवेदन किया था। कॉलेजों का कहना था कि 2014 के एक्ट में एनओसी की बाध्यता का नियम बनाया गया था, ऐसे में उन पर यह नियम लागू ही नहीं होता। हाईकोर्ट ने कॉलेजों की इसी दलील के आधार पर यूनिवर्सिटी को तीन सप्ताह का समय कॉलेजों के पक्ष में निर्णय लेने के लिए दिया था।
इसी क्रम में यूनिवर्सिटी ने पहले कॉलेजों के कागजात की पड़ताल की और अब उनके द्वारा एनसीटीई में प्रस्तुत दस्तावेजों को पत्र भेजकर मांगा है जिससे कॉलेजों की ओर से प्रस्तुत कागजात जांचे जा सकें। कुलपति प्रो. अशोक कुमार का कहना है कि जब तक कॉलेजों और एनसीटीई के दस्तावेजों का मिलान नहीं किया जाएगा, तब तक किसी निर्णय पर नहीं पहुंचा जा सकता।
यह है एनओसी प्रकरण
गोरखपुर। फर्जी एनओसी से मान्यता हासिल करने के आरोप में घिरे 40 कॉलेजों में से एनसीटीई ने 11 को ही दोषी माना था और 29 को दोषमुक्त करार दिया था। एनसीटीई के निर्णय के बावजूद यूनिवर्सिटी ने सभी 40 कॉलेजों को दोषी मानते हुए संबद्धता देने से इनकार कर दिया था। यूनिवर्सिटी के इस फैसले के विरोध में कॉलेजों ने हाईकोर्ट की शरण ली। एनसीटीई एक्ट को लेकर कॉलेजों की दलील सुनने के बाद हाईकोर्ट ने 24 जून को उनके पक्ष में फैसला सुना दिया था और यूनिवर्सिटी को पक्ष में फैसला लेने के लिए तीन सप्ताह का समय दिया।