सत्संग से शुरू होकर गीताप्रेस के स्थापित होने के बाद आज गीताप्रेस ट्रस्ट हिंदू धर्म की पुस्तकों को प्रकाशित करने वाली विश्व की सबसे बड़ी संस्था है। सनातन धर्म के सिद्धांतों के साथ जयदयाल गोयन्दका ने 1923 में इसकी स्थापना की थी।
मुख्य रूप से श्रीमद्भगवद्गीता छापने के लिए स्थापित इस प्रेस में प्रति दिन तकरीबन 50 हजार पुस्तकों की छपाई की जाती है। पिछले वर्ष नवंबर से गीताप्रेस के कर्मचारियों की हड़ताल की वजह से प्रकाशन का काम प्रभावित है और पिछले माह आठ अगस्त से छपाई का काम पूरी तरह से ठप है।
कोलकाता से शुरू हुआ था यह सफर
गीताप्रेस के जनक जयदयाल गोयन्दका का जन्म चूरू (राजस्थान) के व्यापारी परिवार में हुआ था। सफल व्यापारी और आध्यात्मिक प्रवृत्ति के जयदयाल गोयन्दका सेठ जी के नाम से मशहूर थे। सेठ जी व्यापार कार्य से कोलकाता जाते थे और वहां जाने पर सत्संग करवाते थे।
सेठ जी और सत्संग जीवन पर्यन्त एक दूसरे के पर्याय रहे। गीता प्रचार के लिए गोरखपुर (उत्तरप्रदेश) में गीताप्रेस, सामूहिक रूप से लोगों के भवनत्-चिंतन, भजन, सत्संग के लिए स्वर्गाश्रम ऋषिकेश (उत्तराखंड) और भारतीय शिक्षण पद्धति से ज्ञानवान, चरित्रवान नई पीढ़ी के लिए चूरू राजस्थान में श्रीऋषिकुल ब्रह्मचर्याश्रम का निर्माण कराया।
संस्था का प्रधान कार्यालय गोविंद भवन कोलकाता में है और एक रजिस्टर्ड सोसाइटी है। यहां हमेशा भजन कीर्तन और समय समय पर संत महात्माओं के प्रवचन होता रहता है। पुस्तकों की थोक व फुटकर बिक्री के साथ यहां हाथ से बने कपड़े, कांच की चूड़ियां, आयुर्वेदिक औषधियां की बिक्री होती है।
600 रुपये के हैंडसेट प्रिंटिंग मशीन से शुरू हुआ गीताप्रेस
कोलकाता में सत्संग के साथ साधकों का समूह बढ़ता गया और सभी को स्वाध्याय के लिए श्रीमद्भगवद्गीता की आवश्यकता हुई। सुलभता से गीता मिल सके, इसके लिए जयदयाल गोयन्दका (सेठजी) ने कोलकाता के वणिक प्रेस से गीता की पांच हजार प्रतियां छपवाई।
पहला संस्करण कुछ ही दिनों में समाप्त हो गया। छह हजार और प्रतियां छापी गई, लेकिन इसकी छपाई में काफी दिक्कतें आईं। मशीन बार बार रोककर संशोधन करना पड़ता था। साथ ही इसमें कई तरह की त्रुटियां भी हो रही थी। तब अशुद्धि रहित गीता छापने के लिए अपना प्रेस लगाने का निर्णय लिया गया।
घनश्याम दास जालान और महावीर प्रसाद पोद्दार के प्रस्ताव पर और 23 अप्रैल 1923 को गोरखपुर के हिंदी बाजार में एक छोटे से मकान में प्रेस की स्थापना की गई और नाम रखा गया ‘गीताप्रेस’।
सेठजी के निर्देश पर इन दोनों ने गीताप्रेस का कामकाज संभाला। 24 सितंबर 1923 को पहली हैंडप्रेस प्रिंटिंग मशीन 600 रुपये में खरीदी गई। बेहतर छपाई के लिए 22 अक्टूबर 1923 को दो हजार रुपये में ट्रेडिल मशीन खरीदी गई। मनमाफिक छपाई न मिलने पर 20 जनवरी 1924 को तकरीबन सात हजार रुपये की बड़ी रॉयल पैनबेल्ट मशीन खरीदी गई।
किराए का मकान बहुत छोटा होने पर शेषपुर में 12 जुलाई 1926 को 10 हजार रुपये में वर्तमान के गीताप्रेस के पूर्वी हिस्से को खरीदा गया और धीरे धीरे इसका विस्तार होता गया। गीता के अलावा रामचरितमानस, कल्याण पत्रिका समेत अन्य बहुत सी पुस्तकों का प्रकाशन शुरू हुआ।
धीरे धीरे विस्तार होते होते न सिर्फ बीस स्वचालित मशीनें लग गईं। और यहां प्रतिदिन तकरीबन 50 हजार पुस्तकों की छपाई होती है। गीताप्रेस अब तक 410 मिलियन गीता और 70 मिलियन रामचरितमानस का प्रकाशन कर चुका है।
गांधी जी की सम्मति से कल्याण और कल्याण-कल्पतरू में नहीं छपता विज्ञापन
गीताप्रेस की मासिक पत्रिका कल्याण मुंबई शुरू होकर गोरखपुर पहुंच गई। हनुमान प्रसाद पोद्दार के प्रयास से गीताप्रेस की मासिक पत्रिका कल्याण का पहला अंक मुंबई के वेंकटेश्वर प्रेस में छपकर प्रकाशित हुई। पहले वर्ष में बारह साधारण अंक प्रकाशित हुए।
बाद में कल्याण के प्रकाशन की योजना गोरखपुर से करने की बनाई गई। अगस्त 1927 में गोरखपुर से इसका प्रकाशन शुरू हुआ। दूसरे वर्ष में कल्याण का प्रथम अंक विशेषांक ‘भगवन्नामांक’ के नाम से प्रकाशित हुई। कल्याण के तर्ज पर ही अगस्त 1927 में अंग्रेजी भाषा में ‘कल्याण कल्पतरू’ के नाम से मासिक पत्रिका प्रकाशित होनी शुरू हुई।
महात्मा गांधी की सम्मति और सेठजी की नीति के अनुसार कल्याण और कल्याण-कल्पतरू में नहीं छपता विज्ञापन नहीं छापा जाता है। तकरीबन 1600 प्रतियों से शुरू हुआ कल्याण का प्रकाशन अब ढाई लाख से भी ज्यादा है।
:: यहां 15 भाषाओं में प्रकाशित होती हैं पुस्तकें
समस्त जन तक श्रीमद्भगवद्गीता पहुंच सके, इसके लिए गीताप्रेस हिंदी, संस्कृत, बांग्ला, गुजराती, मराठी, तमिल, तेलुगू, कन्नड़, उड़िया, असमिया, मलयालम, पंजाबी, नेपाली, उर्दू समेत कुल 15 भाषाओं में प्रकाशित होती हैं।
इस प्रेस में श्रीमद्भगवद्गीता के साथ-साथ रामायण, पुराण, उपनिषद, भक्त चरित्र, नित्यपाठ, साधन भजन, बालोपयोगी, स्त्रियोपयोगी, सर्वोपयोगी पुस्तकें, चित्रकथा, जयदयाल जी गोयन्दका (सेठजी), हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), स्वामी रामसुखदासजी के प्रवचनों की पुस्तकें प्रकाशित होती है।
ये हैं ट्रस्टी
0 ईश्वर प्रसाद पटवारी, वैद्यनाथ अग्रवाल, नारायण अजीत सरिया, देवीदयाल अग्रवाल (गोरखपुर), राधेश्याम खेमका (वाराणसी), जगदीश जालान (लखनऊ), रामस्वरूप केजरीवाल, (राउरकेला, उड़ीसा), विष्णु प्रसाद चांदगोटिया (दिल्ली), केशव राम अग्रवाल, पूनमचंद्र राठी (कोलकाता)
‘गीता तत्वांक’ में है महात्मा गांधी का आलेख
1939 के कल्याण के विशेषांक ‘गीता तत्वांक’ में कई महापुरुषों का आलेख संकलित है। महात्मा गांधी, मदन मोहन मालवीय समेत अन्य महापुरुषों ने श्रीमद्भगवद्गीता पर अपने विचार व्यक्त किए हैं और इसे बेहतर समाज के लिए उपयोगी बताया है। यह आलेख कल्याण पत्रिका के प्रकाशन के 14वें वर्ष के पहले अंक में प्रकाशित हुआ था।
महात्मा गांधी का आलेख
प्रत्येक शिक्षण संस्थाओं में पढ़ाई जाए गीता: महात्मा गांधी
:: गीता की शिक्षा
मैं तो चाहता हूं कि गीता न केवल राष्ट्रीय शालाओं में ही बल्कि प्रत्येक शिक्षा-संस्थाओं में पढ़ायी जाए। एक हिंदू बालक या बालिका के लिए गीता का न जानना शर्म की बात होनी चाहिए। यह सच है कि गीता विश्वधर्म की एक पुस्तक है। बाहरी दबाव से गीता कभी विश्वव्यापिनी नहीं होगी। यह विश्वव्यापिनी तो तभी होगी जब उसके प्रशंसक उसे जबर्दस्ती दूसरों के गले न उतारकर स्वयं अपने जीवन द्वारा उसकी शिक्षाओं को मूर्त रूप देंगे।
:: गीता में श्रद्धा
जो वस्तु बुद्धि से भी अधिक है, परे है- वह श्रद्धा है। बुद्धि का उत्पत्ति स्थान मस्तिष्क है, श्रद्धा का हृदय। और यह तो जगत् का विच्छिन्न अनुभव है कि बुद्धि बल से सहस्त्रश: अधिक है। श्रद्धा से जहाज चल रहे हैं, श्रद्धा से मनुष्य पुरुषार्थ करता है, श्रद्धा से वह पहाड़ों-अचलों को चला सकता है। श्रद्धावान को कोई परास्त नहीं कर सकता। बुद्धिमान को हमेशा पराजय का डर रहता है। इसी कारण भगवान ने गीता के सतरहें अध्याय में कहा है- ‘यो चच्छद्ध: स एव स:’, जैसी जिसकी श्रद्धा होती है वैसा ही वह बनता है। मनुष्य यह श्रद्धा कैसे प्राप्त करे? इसका उत्तर गीता में है, रामचरितनास में है। भक्ति से, सत्संग से श्रद्धा प्राप्त होती है।
:: गीता में अनासक्ति
अपने पराए के बीच भेद न रखने की बात तो गीता के पन्ने पन्ने में है। पर यह कैसे हो सकता है? यों सोचते सोचते हम इस निश्चय पर पहुंचेंगे कि अनाशक्तिपूर्वक सब काम करना ही गीता की प्रधान ध्वनि है।
:: गीता से सब समस्याओं का हल
‘जब जब संकट पड़ते हैं, जब तक संकट टालने के लिए हम गीता के लिए हम गीता के पास दौड़ जाते हैं और उससे आश्वासन पाते हे। हमें गीता को इस दृष्टि से पढ़ना है। हम हमारे लिए सद्गुुरु रूप है, मातारूप है और हमें विश्वास रखना चाहिए कि उसकी गोद में सिर रखने से हम सही सलामत रहेंगे। गीता के द्वारा हम अपनी तमाम धार्मिक उलझनें सुलझाएंगे। इस विधि से जो रोज गीता का मनन करेगा, उसे उसमें से नित्य नया आनंद मिलेगा- नए अर्थ प्राप्त होते रहेंगे। ऐसी एक भी धार्मिक समस्या नहीं, जिसे गीता हल न कर सके।