आवास पर कब्जा न दिलाने में आवास आयुक्त सहित चार के खिलाफ केस
संतोष सिंह
गोरखपुर। आवास आवंटन के बाद कब्जा दिलाने में गड़बड़ी पर यूपी के आवास आयुक्त अजय चौहान सहित चार अफसरों के खिलाफ धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया है। यह केस कोर्ट के आदेश पर दर्ज हुआ है। यूं तो यह केस मई में दर्ज हुआ, पर मामला बड़े लोगों से जुड़ा होने के चलते शाहपुर पुलिस ने किसी को कानोकान खबर नहीं होने दी। पुलिस के विपरीत, प्रशासनिक स्तर पर आवास आवंटन से जुड़े इसी मामले में आवास विकास परिषद गोरखपुर के अधिशासी अभियंता मोहम्मद हाशिम इकबाल को निलंबित करके लखनऊ मुख्यालय से संबद्ध किया जा चुका है। अधिशासी अभियंता 11 अगस्त 2015 से गोरखपुर में तैनात थे।
जानकारी के मुताबिक शाहपुर थाने में दर्ज केस में आवास आयुक्त के साथ अधिशासी अभियंता मोहम्मद हाशिम इकबाल, संपत्ति अधिकारी आरपी तिवारी और अवर अभियंता संतराम मिश्रा को नामजद किया गया है। दरअसल, बेतियाहाता के शरदचंद्र दीक्षित ने पत्नी निर्मला दीक्षित के नाम से 6 जुलाई 1985 शाहपुर में आवास विकास परिषद से आवास संख्या एमआईजी ए-275 को खरीदा था। इसी बीच परिषद ने आवास की निर्धारित कीमत बढ़ा दी, फिर निर्मला दीक्षित ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करके राहत की मांग की। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को प्रतिमाह एक हजार रुपये की दर से किस्त जमा करने की अनुमति प्रदान कर दी। बाद में उच्च न्यायालय ने निर्मला को जिला एवं सत्र न्यायालय में वाद दाखिल करने का आदेश दिया। 31 मार्च 2016 में एकमुश्त समाधान योजना का एलान हुआ तो आवंटी ने 8,95,998 रुपये जमा करा दिए। इसके बावजूद आवास विकास परिषद के अफसरों ने कब्जा नहीं दिया। अलबत्ता आवास को 5000 रुपये प्रतिमाह किराये पर उठा दिया।
इसकी जानकारी आवंटी की तरफ से आवास आयुक्त अजय चौहान सहित तमाम अफसरों को दी गई, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इसके बाद आवंटी ने जिला एवं सत्र न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। न्यायालय ने दोनों पक्षों की दलील सुनी और मामले में मुकदमा दर्ज करने का आदेश पारित कर दिया। इसी आधार पर आवंटी ने तहरीर दी और शाहपुर पुलिस ने केस दर्ज कर लिया। मामला 29 मई 2019 को दर्ज हुआ, लेकिन पुलिस ने इसे दबाए रखा। इस सिलसिले में शाहपुर पुलिस के साथ आवास आयुक्त से मोबाइल फोन पर संपर्क करने की कोशिश की गई, लेकिन बात नहीं हो सकी। जब भी आवास आयुक्त या फिर पुलिस का पक्ष आएगा, उसे प्रकाशित किया जाएगा।
33 साल बाद बैनामा, 34वें साल कब्जा मिला
निर्मला दीक्षित ने 1985 में आवास खरीदने का पैसा जमा कराया था, लेकिन विवाद चलता रहा। 27 फरवरी 2018 को आवास का बैनामा निर्मला के पक्ष में हुआ था, लेकिन मई 2019 तक कब्जा नहीं मिल सका। जब न्यायालय की सख्ती हुई, तब जाकर जून में किरायेदार को बाहर निकालकर आवंटी को कब्जा दिलाया गया। यानी आवंटी को 34 साल बाद कब्जा मिल सका। आवंटी के मुताबिक ऐसा भ्रष्टाचार की वजह से हुआ। एक तरफ किराये की रकम हड़पी गई तो दूसरी तरफ अतिरिक्त शुल्क जमा कराके प्रताड़ित किया गया।
दादागीरी पर उतर आए अफसर, अतिरिक्त शुल्क भी वसूला
आवास आवंटन के इस मामले आवास विकास परिषद के अफसर दादागीरी पर उतर आए थे। 18 नवंबर 2016 को अफसरों ने आवंटी को पत्र भेजा और अतिरिक्त शुल्क जमा करने की बात कही। साथ ही हिदायत दी कि अतिरिक्त शुल्क नहीं जमा हुआ तो आवंटन निरस्त कर दिया जाएगा। इससे चिंतित आवंटी ने अतिरिक्त शुल्क भी जमा कर दिया, लेकिन आवास की रजिस्ट्री नहीं की गई। कब्जा तक दिलाने की पहल नहीं हुई। आवंटी ने एक लाख रुपये अवैध तरीके से वसूलने के आरोप लगाए। कहा कि यह रकम आवास के रखरखाव के एवज में वसूले गए थे। आवंटी ने आवास विकास परिषद में 1985 से 2016 तक तैनात अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।