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अवध एक्सप्रेस के यात्रियों ने बताई आपबीती

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गोरखपुर। बेहतर सुविधा और सुरक्षित माहौल की उम्मीद से एसी बोगी में सफर का विकल्प चुनने वाले अवध एक्सप्रेस के मुसाफिरों को रेल प्रशासन की बेरुखी भारी पड़ी। रविवार रात आगरा के ईदगाह रेलवे स्टेशन पर कुछ लोगों ने पथराव करके यात्रियों को दहशत के जख्म दिए तो रेलवे ने भी उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया। नतीजे में तीन वातानुकूलित बोगी (ए-1, बी-1, बी-2) के यात्रियों ने आगरा से गोरखपुर तक लगभग 427 किलोमीटर की दूरी और 18 घंटे का वक्त पथराव से टूटी खिड़कियों और चकनाचूर शीशों के बीच गुजारा।
रात भर ऐसे माहौल का सामना करने वाले अवध एक्सप्रेस के यात्रियों का सोमवार शाम गोरखपुर स्टेशन पर जब अमर उजाला टीम से सामना हुआ तो वे फूट पड़े। किसी ने ऑनलाइन शिकायत पर त्वरित सेवा देने के रेलवे के सिस्टम की खिल्ली उड़ाई तो किसी ने एक ट्वीट पर मुसाफिरों को चलती ट्रेन में सुविधा मुहैया कराने के दावे की। हालात से टूटे एक मुसाफिर ने सपाट कहा, उत्पातियों ने दहशत दी तो राहत न देकर रेलवे ने दर्द बढ़ा दिया।
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अनसुनी व अनदेखी पर फूटा था गुस्सा
बांद्रा से गोरखपुर आ रही अवध एक्सप्रेस के यात्रियों ने बताया कि ईदगाह स्टेशन पर पथराव से तीन एसी बोगी के शीशे चकनाचूर हो गए। इससे कुछ को चोट लगी, जबकि सभी यात्रियों में घबराहट फैल गई। सदमे और दहशत के इस माहौल में न सुरक्षा दी न बिखरे कांच की सफाई की। आगरा फोर्ट और टूंडला पर पांच-पांच मिनट रोककर ट्रेन बढ़ा दी तो यात्रियों का गुस्सा फूट गया। चेन पुलिंग कर हंगामा किया तो एक बजे तक ट्रेन खड़ी रही। तो भी खिड़कियों के टूटे कांच की जगह टेप चिपकाने की औपचारिकता भर हुई।
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यात्री बोले
लगा कि एकाएक ओले पड़ने लगे
ट्रेन रात करीब 10:03 बजे आगरा फोर्ट और ईदगाह स्टेशन के बीच थी। एकाएक गाड़ी रुकी और बोगी से तड़पड़-तड़पड़ कुछ टरकाने की आवाजें आने लगीं। लगा कि ओले गिर रहे हैं लेकिन कुछ सेकेंड में एसी कोच के शीशे टूटकर पत्थर भीतर आने लगे। कुछ बमुश्किल खुद को बचा पाए, जबकि खिड़की के पास कुछ को चोट भी आई।
-अमरनाथ पाठक, यात्री
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पत्थरबाजी के बाद भी नहीं बढ़ी सुरक्षा
ट्रेन में आराम से लेट कर गाना सुन रहा था। इसी बीच एक बड़ा सा पत्थर बगल में गिरा। देखते-देखते बोगी में अफरा तफरी मच गई। लोगों एक दूसरे को भगदड़ न मचाने और पत्थरों से बचने की सलाह दे रहे थे। इतनी बड़ी घटना हो गई लेकिन पूरे रास्ते कोई जिम्मेदार किसी यात्री का हाल जानने तक नहीं आया। तकलीफदेह रहा यह सफर।
-अंश कश्यप, यात्री
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बमुश्किल बचाए बच्चे-महिलाएं
अचानक से शुरू हुई पत्थरबाजी से बचने के तरीके नहीं सूझ रहे थे। बोगी में छोटे बच्चे और महिलाएं भी मौजूद थे। कुछ लोगों ने समझदारी दिखाई और बच्चों, महिलाओं को ऊपर की सीट पर शिफ्ट किया। हम लोग खिड़की से हटकर साइडों से चिपक गए। कुछ समय सांसे थमी रहीं। बमुश्किल बचे और अपनों को बचा पाए।
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-हसन शाहिद, यात्री
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चारों तरफ बिखरे थे कांच के टुकड़े
अचानक पत्थरों की बारिश से हर किसी की घबराहट बढ़ गई। गनीमत रही पेंट्री कार के कुछ स्टाफ की समझदारी से, जिसने सबको अलर्ट करते हुए बोगियों के सारे दरवाजे बंद कराए। कुछ सेकेंड में सभी एसी बोगी के भीतर सीट से फर्श तक कांच के टुकड़े बिखरे पड़े थे। रास्ते में न बोगी बदली, न कांच साफ कराया, न सुरक्षा कर्मी आया।
- ज्यान अली
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