गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट ‘शब्द-संवाद’ ने दूसरे और अंतिम दिन रविवार को विश्राम लिया। सेंट एंड्रयूज डिग्री कॉलेज सभागार में साहित्य, संगीत और नाटक का मंच सजा। युवाओं को सफलता यज्ञ के मंत्र मिले। बात महिलाओं की दशा पर भी हुई। निष्कर्ष निकला, हर समस्या का समाधान साहित्य के जरिये संभव है। यह सिलसिला रुकना नहीं चाहिए। ऐसा समागम तो हर साल होना चाहिए।
आगे जाना है तो सूरज की तरह जलना होगा
देश में ख्यात हुए शहर के युवा पत्रकारों और फिल्म निर्देशक ने साझा किए अपनी सफलता के राज
अमर उजाला ब्यूरो
गोरखपुर। छोटे शहर के चमकते सितारे। यह था चर्चा का विषय। चर्चा करने वाले भी वे ही सितारे थे जो गोरखपुर जैसी जगह से उदित हुए पर आज उनकी चमक ही बड़े शहरों में उनकी पहचान है। ये युवा पत्रकार और फिल्म निर्देशक भी हैं। उन्होंने फेस्ट में जुटे युवाओं से अपनी सफलता के राज साझा किए। शब्द अलग थे पर भाव एक-आगे जाना है तो सूरज की तरह जलना होगा। कड़ी मेहनत, आत्मविश्वास, भरोसा और ज्ञान का कोई विकल्प नहीं। श्रोताओं ने इसे गुना भी।
संचालक शुभेंदु सत्यदेव के सवाल पर राज्यसभा टीवी की एंकर अमृता चौरसिया ने कहा कि गोरखपुर से नई दिल्ली गई तो कहा गया कि कहां समुद्र में आ गईं। बड़ी मछलियां हैं निगल जाएंगी पर हार नहीं मानी। संघर्ष किया और बेहतर मुकाम हासिल किया। 24 घंटे काम करने की शर्त पर नौकरी मिली थी लेकिन आत्मविश्वास से स्वीकार किया। शिखर पर पहुंचने के लिए अच्छी सोच, दिमाग की जरूरत होती है। घर-परिवार संभालने के साथ ही नौकरी कर रही हूं।
फिल्म निर्देशक सुशील राजपाल ने कहा कि गोरखपुर जैसे शहर से मुंबई गया। प्रतिकूल परिस्थितियों में काम के बूते आगे बढ़ा। सुशील ने युवाओं को नसीहत भी दी कि हर मां-बाप चाहते हैं कि बेटा डॉक्टर या इंजीनियर बने पर आप वही करें जो आपको अच्छा लगे। हां, बेहतर करने को पलायन जरूरी नहीं। अपने शहर में ही अच्छा किया जा सकता है।
टीवी न्यूज एंकर चित्रा त्रिपाठी ने बताया कि जब गोरखपुर के छोटे चैनल में थी तो दोस्तों के कपड़े पहनकर एंकरिंग की। अब बड़े चैनल में हूं। डिजाइनर ड्रेस तैयार करते हैं। जुनून-जिद के साथ खुद पर भरोसा था। दिल्ली में बड़े लोगों के बीच में मेहनत से जगह बनाई। चित्रा ने युवाओं को टिप्स में कहा कि सोशल मीडिया से जुड़ें। भाषा की सही जानकारी के साथ आत्मविश्वास से आगे बढ़ें। युवाओं के लिए दिल्ली के दरवाजे खुले हैं। नौकरी और पैसा भी खूब है।
पत्रकार संजय सिंह ने कहा कि पत्रकारिता का कोई सटीक फार्मूला नहीं है। आपको आत्मविश्वास के साथ प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखनी होगी। सामाजिक सरोकार पत्रकारिता का मूल उद्देश्य है। इंसान अकेले नहीं बनता, उसे बनाने का काम समाज करता है। छोटे शहर से जाकर दिल्ली में मुकाम हासिल करना सपने जैसा है।