गोरखपुर। गीतकार और कहानीकार मनोज मुंतशिर ने रविवार को गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट ‘शब्द-संवाद’ की महफिल लूट ली। युवाओं के बीच अपनी सफलता की कहानी सुनाई। कहा कि गौरीगंज अमेठी में भैंस की पूंछ मरोड़कर पला-बढ़ा हूं। दिल से लिखता हूं, जो कान से होकर दिमाग और दिल को छू जाता है। ... मेरे रश्के कमर को नए अंदाज में पेश किया है। इस गीत पर छोटे बच्चे, युवा और बुजुर्ग भी थिरकते हैं।
सेंट एंड्रयूज डिग्री कॉलेज में पिता शिव प्रताप शुक्ला और मां प्रेमा शुक्ला के साथ आए मनोज मुंतशिर ने युवाओं का हौसला बढ़ाया। कहा कि जब तक कोई बैठने को न कहे तब तक खड़े रहें। मुकाम हासिल करें, फिर बराबर में बैठने की कोशिश करें। यही मैंने किया है। मुंबई मायानगरी है। ग्लैमर के चक्कर में न पड़ें। आपके पास कुछ कहने और बताने को हो, तभी मुंबई जाएं। आप जितना पढ़ेंगे, उतना ही अच्छा लिखेंगे। पढ़ना भरना और लिखना छलकना है। भाषा वही अच्छी है, जो सामान्य व्यक्ति की समझ में आए। अब गाने में भी इसी पैटर्न पर लिखे जा रहे हैं। उन्होंने नए गीतकारों को उर्दू पढ़ने और समझने की सलाह दी।
अब युवाओं के लिए लिखे जा रहे गाने
मनोज ने कहा कि अब गाने 13 से 33 वर्ष के लोगों के लिए लिखे जा रहे हैं। इसका दु:ख है लेकिन निर्माता-निर्देशक इससे कम या फिर उससे ऊपर की उम्र वालों के लिए गीत लिखने की बात नहीं करते। माना जा रहा है, इसी उम्र के लोग गाने को सुनते और उसपर थिरकते हैं।
फिल्म, इल्म के बीच दीवार खड़ी करना गलत
गीतकार ने कहा कि फिल्म और इल्म के बीच दीवार खड़ी करने की कोशिश की जाती है। यह गलत है। फिल्मों का साहित्य से गहरा नाता है। मुंतशिर ने कैफी आजमी और फिराक गोरखपुरी के कई शेर सुनाए। फिर श्रोताओं से पूछा कि फिल्म और इल्म में कोई अंतर है क्या? तालियों की गड़गड़ाहट के साथ लोगों का जवाब था नहीं। मुंतशिर ने कहा कि जो लोग कहते हैं कि फिल्मकार इल्मदार नहीं होते हैं, मैं उनकी निंदा करता हूं।
तनुश्री मामले में जांच के बाद हो कड़ी कार्रवाई
बाहुबली, रुस्तम और बादशाहो सहित कई फिल्मों के लिए गीत, पटकथा लिखने वाले मनोज मुंतशिर ने अभिनेत्री तनुश्री दत्ता के आरोपों पर चुप्पी तोड़ी। एक सवाल पर मनोज ने कहा कि इस मामले में कौन दोषी है, वह नहीं जानते। यह काम जांच एजेंसी का है लेकिन कोई दोषी है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। मनोज ने अपनी फिल्म बाहुबली की चर्चा की और डायलॉग भी सुनाया। कहा कि महिलाओं को छूने वाली उंगलियां नहीं उस व्यक्ति का गला काटते हैं।
अपनी प्रेम कथा सुनाई तो बजीं तालियां
मनोज 11, 12वीं कक्षा की अपनी प्रेम कहानी सुनाई तो पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। उन्होंने कहा कि एक दिन अचानक प्रेमिका आई और बोली, अब मैं आपके साथ शादी नहीं कर सकती हूं। आप मेरे पापा को पसंद नहीं हैं। वे चाहते हैं दामाद डॉक्टर बने। आप गाना-बजाना करते हैं। यही नहीं, प्रेमिका ने अपनी फोटो और चिट्ठी तक मांग ली। मैंने भी कहा ये सब तो ठीक है। मेरी दो साल की जवानी वापस कौन देगा।
भूख समस्या, यह तो मानना ही होगा
गोरखपुर। नाट्य विमर्श में समाज के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा हुई। कहा गया कि नाटक से मुद्दों को जनता के सामने लाया जाता है। अब समाज की जिम्मेदारी है कि वह सही, गलत को पहचानकर आगे बढ़े। वक्ताओं ने जनसंख्या वृद्धि पर चिंता भी जताई और कहा कि नाटक के जरिए लोगों को जागरूक किया जाना चाहिए। रंगमंच के चर्चित कलाकार और फिल्म अभिनेता विनय पाठक ने कहा कि देश में भूख की समस्या है, इसे अब भी मानना पड़ेगा। समसामयिक मुद्दों पर नाटक बनते हैं और उनका मंचन किया जाता है। अब छोटे शहरों में भी साहित्य की तरह नाटक की कद्र है। अभी मल्टीप्लेक्स बने हैं तो आने वाले समय में थियेटर भी बनेंगे। विनय ने कहा कि नाटक से अब पैसा भी मिलने लगा है। इसमें मराठी और गुजराती थियेटर का अहम योगदान है। मुंबई में छोटी फिल्मों के निर्माता-निर्देशक भी हैं। नाटक में निवेश किया जा रहा है। बिडला समूह नाटक का मंचन कराता है। महेंद्रा कंपनी की तरफ से नाटककार को अवार्ड दिया जाता है। यह बड़ा बदलाव है। इससे रंगमंच की दुनिया बदली है। पत्रकार शिवकेश मिश्र और राजशेखर ने भी रंगमंच की दुनिया को अच्छा बताया। कहा कि कलाकार की सफलता के पीछे लेखक का बड़ा हाथ होता है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। रंगमंच और कैमरे का रिश्ता गहरा है। हालांकि नाटक से पहले तैयारी की जाती है। कैमरे के सामने सिर्फ एक्शन होता है। रिटेक की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है।