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प्राइवेट प्रैक्टिस की जांच से हड़कंप

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शिवम सिंह
गोरखपुर।
सीएम योगी आदित्यनाथ के दौरे के बाद प्राइवेट प्रेक्टिस करने वाले सरकारी डॉक्टरों में हड़कंप मचा हुआ है। सीएम की सख्ती से इन डॉक्टरों में बेचैनी बढ़ गई है। सोमवार को डॉक्टर अपने प्राइवेट क्लीनिक पर नजर ही नहीं आए। यही नहीं कई ने तो क्लीनिक पर लगे बोर्ड तक हटा दिए हैं।
मेडिकल कॉलेज का शायद ही कोई ऐसा डॉक्टर है, जो प्राइवेट प्रेक्टिस नहीं करता है। सीनियर चिकित्सक हों या फिर जूनियर, सभी प्राइवेट क्लीनिक की जाल बिछाए हुए हैं। सरकारी ओपीडी में आने वाले मरीजों को ही बेहतर सुविधा देने का भरोसा दिलाकर डॉक्टर के दलाल मरीजों को फंसाते हैं। फिर गरीब मरीजों से मोटी कमाई करते हैं। सरकारी अस्पताल में मरीजों के साथ अभद्र व्यवहार करने वाले इन्हीं डॉक्टरों का व्यवहार नर्सिंग होम में आते ही बदल जाता है। वजह साफ है सरकारी में उन्हें मरीज से कोई अतिरिक्त आमदनी नहीं होती है और प्राइवेट में मुंहमांगी रकम वसूलते हैं। डॉक्टरों के इस मकड़जाल पर सीएम योगी आदित्यनाथ की सख्ती से हड़कंप मचा हुआ है। योगी के सख्त तेवर के बाद जिला प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। ऐसे डॉक्टरों की सूची तैयार की जा रही है, जो सरकारी ओपीडी का इस्तेमाल कर प्राइवेट प्रेक्टिस चमकाने में लगे हुए हैं।
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निलंबित प्राचार्य और विभागाध्यक्ष की भी निजी क्लीनिक
मेडिकल कॉलेज के निलंबित प्राचार्य प्रो. राजीव मिश्रा की भी निजी पैथोलॉजी चलती है। मेडिकल कॉलेज गेट के सामने ही श्रीराम पैथोलॉजी के नाम से प्रो. मिश्रा की निजी क्लीनिक है। वहीं आर्थो विभागाध्यक्ष डॉ. अशोक यादव, मेडिसिन के डॉ. माही मित्तल, ईएनटी के डॉ. आरएन शाही भी प्राइवेट क्लीनिक चलाते हैं। यह नाम सिर्फ बानगी है। मेडिकल कॉलेज के तकरीबन सभी विभागाध्यक्ष कहीं न कहीं क्लीनिक खोले हुए हैं और जिनके पास क्लीनिक नहीं है, वह घर पर ही प्राइवेट प्रेक्टिस करते हैं। कई ऐसे भी है जो मित्र डॉक्टर के नर्सिंग होम का इस्तेमाल करते हैं।

ऑर्थो वार्ड में दलालों का धंधा जोरों पर
यूं तो हर वार्ड में ही दलाल घूमते हैं लेकिन हड्डी वार्ड में यह धंधा जोरों पर है। ये यहां मरीजों की संख्या ज्यादा होने का फायदा उठाते हैं। पंद्रह, बीस दिन के इंतजार के बाद भी ऑपरेशन का नंबर न आने पर ये डॉ. अशोक यादव की प्राइवेट क्लीनिक का पता बताते हैं। महराजगंज की एक मरीज ने अभी कुछ महीने पहले ही इसकी शिकायत की थी लेकिन कॉलेज प्रशासन ने जांच तो दूर शिकायत ही दबा दी थी।

सरकारी आवास में भी करते हैं प्रेक्टिस
डॉ. ललित मोहन, डॉ. रीता सिंह, डॉ. अश्वनी मिश्रा जैसे कई नाम ऐसे हैं, जो सरकारी आवास में ही प्राइवेट प्रेक्टिस करते हैं। सरकारी ओपीडी से चंद कदम की दूरी पर मरीजों से रुपये वसूले जाते हैं और कॉलेज प्रशासन इस पर खामोश बना रहता है।

नोटिस दिया तो दे दिया इस्तीफा
प्राइवेट प्रेक्टिस का मुद्दा उठने पर कॉलेज प्रशासन ने कागजी कार्रवाई की थी। डॉक्टरों को नोटिस जारी कर तीन दिन में जवाब मांगा गया। जवाब तो किसी ने नहीं दिया लेकिन डॉ. वीके मौर्या ने सेवानिवृत्ति ले ली और डॉ. पवन सिंह ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद कॉलेज प्रशासन ने कार्रवाई ही बंद कर दी।

गोरखपुर डॉक्टरों का हब बना
गोरखपुर जिला ही डॉक्टरों का हब बन गया है। बिहार, नेपाल से बॉर्डर सटा होने से यहां मरीजों की बाढ़ रहती है। इन मरीजों को प्राइवेट क्लीनिक में लाने के लिए डॉक्टर दलालों का इस्तेमाल करते हैं। पहले वे संविदा पर सरकारी अस्पताल आते हैं और फिर वहीं से मरीजों को बेहतर इलाज का झांसा देकर धीरे-धीरे प्राइवेट क्लीनिक भेजना शुरू कर देते है। जब प्राइवेट क्लीनिक रफ्तार पकड़ लेती है तो सरकारी से नाता तोड़ देते हैं। गरीब मरीजों से मनचाही रकम वसूलने में इन्हें जरा भी गुरेज नहीं है। यही वजह है कि चंद महीनों की प्रेक्टिस में ही बड़े-बड़े नर्सिंग होम खड़े हो जा रहे हैं।
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कमीशन के फेर में फंस रहे मरीज
शहर के सभी निजी पैथोलॉजी के संचालकों की डॉक्टरों से सेटिंग होती है। डॉक्टर इनके पास मरीज भेजते हैं और बदले में ये डॉक्टर के पास कमीशन। यही वजह है कि मरीज की जो जांच छोटे पैथोलॉजी पर कम कीमत पर हो जाती है, बड़े पैथोलॉजी पर वह कमीशन के साथ बढ़ जाती है। मरीजों की मजबूरी यह कि डॉक्टर साहब तय पैथोलॉजी की जगह दूसरे पैथोलॉजी की रिपोर्ट देखने को तैयार ही नहीं होते हैं।
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