घाघरा, सरयू नदी में आया पानी का सैलाब थमने का नाम नहीं ले रहा है। हालत यह है कि घाघरा नदी खतरे के निशान से 73 सेमी ऊपर जाकर चार सेमी फिर से नीचे आ गई है, जिससे कटान की आशंका तेज हो गई है। जबकि नवाबगंज में सरयू नदी का पानी न तो घट रहा है और न ही बढ़ रहा है। लेकिन इसका पानी मांझा इलाके के आठ गांव और उसके 29 मजरों में तबाही मचाए हुए है, जिससे लोगों को अपनी घर-गृहस्थी छोड़ गांव से पलायन करना पड़ रहा है।
करनैलगंज में एल्गिन-चरसड़ी बांध पर होने वाली कटान को रोकने के लिए बाढ़ व बचाव कार्य में लगे सिंचाई विभाग के अभियंता अब उन स्परों व कट्स को ऊंचा करने की जद्दोजहद में लगे हैं, जिसके ऊपर से घाघरा का पानी हिलोरे मारकर बंधे से टकरा रहा है।
करनैलगंज में घाघरा नदी अभी भी खतरे के निशान से 78 सेमी ऊपर बह रही है, जबकि नवाबगंज में सरयू नदी का जलस्तर खतरे के निशान से 30 सेमी ऊपर पहुंचकर स्थिर हो गया है। गुरुवार को नदी में करीब दो लाख 61 हजार क्यूसेक पानी डिस्चार्ज होना पाया गया।
कल तक जहां तरबगंज तहसील अंतर्गत आने वाले नवाबगंज इलाके में दो हजार परिवार बाढ़ के पानी से परेशान हुए थे, वहीं एक ही दिन में इनकी संख्या बढ़कर दूनी हो गई है। मांझा राठ, जैतपुर, दुल्लापुर, दुर्गागंज, साकीपुर, सोनौली मोहम्मदपुर, ऐली परसौली व गढ़ी गांव के 29 मजरे बाढ़ के पानी से प्रभावित हैं। जबकि करनैलगंज के चंदापुर किटौली व पसका में भी बाढ़ के पानी से आवागमन की सुविधा ठप हो गई है।
इसके लिए जहां जिला प्रशासन की ओर से करनैलगंज इलाके में 41 नावें लगाकर लोगों को राहत सामग्री मुहैया कराई जा रही है तो वहीं नवाबगंज में बाढ़ से निपटने के लिए 37 नावें लगाई गई हैं। करनलैगंज में घाघरा नदी के घटते जलस्तर से कटान का खतरा बढ़ गया है। बंधे को कटान से बचाने के लिए अफसर स्पर व कट्स को एक मीटर ऊंचा कर रहे हैं। बंधे पर कैंप कर रहे एक्सईएन आरवी सिंह ने बताया कि डिस्चार्ज अधिक होने से नदी की दो धाराएं आपस में मिल गईं है।, जिससे नदी का रुख पल-पल बदल रहा है। फिलहाल खतरे से इन्कार नहीं किया जा सकता।
बाढ़ प्रभावित नवाबगंज के गांवों में तेजी से पानी भरने के कारण यहां रह रहे लोगों के सामने खुद के भोजन के साथ ही जानवरों के चारे का संकट गहरा गया है। जबकि बीमारी भी उन्हें घेरने लगी है। हालांकि गुरुवार को स्वास्थ्य विभाग की टीम ने बाढ़ प्रभावित क्षेत्र का दौरा कर लोगों का उपचार जरूर किया। लेकिन लोगोें की मानें तो मदद के समय स्वास्थ्य सेवा का लाभ उन्हें नहीं मिल पाता। जबकि पानी भरने से विषैले जीव-जंतुओं का खतरा भी उन्हें सताने लगा है।
घाघरा पुल पर नदी के खतरे के निशान से 78 सेमी ऊपर होने के नाते रेलवे की ओर से पुल से होकर गुजरने वाली ट्रेनों का संचालन कॉसन लगाकर किया जा रहा है। डीआरएम आलोक सिंह ने बताया कि घाघरा नदी खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रही है। इसलिए ट्रेनों का संचालन कॉसन के जरिए किया जा रहा है।