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50 पीएचसी में डॉक्टर ही नहीं, कैसे हो इलाज

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गोंडा में पीएचसी मंगुरा बाजार। - फोटो : GONDA
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गोंडा। कोविड-19 के संकट से उबरने के लिए सरकार का प्रयत्न है कि हर व्यक्ति को उसके नजदीक ही जांच व इलाज की सुविधा मिल जाए। हेल्पडेस्क खुल जाए और लोगों को उसका लाभ मिले। लेकिन 25 स्वास्थ्य केंद्र जंगल खंडहर बनकर रह गये हैं। डॉक्टर, दवा, पेयजल सहित कोई सुविधा नहीं है। 45 पीएचसी पर तैैनात डॉक्टर पीजी का प्रशिक्षण ले रहे हैं। पांच पीएचसी में पद ही रिक्त है। ऐसे में सभी 50 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बंद हैं। जर्जर स्वास्थ्य व्यवस्था का इलाज यहां के अधिकारी नहीं कर सके और सभी के सभी केंद्र दुर्दशा के शिकार हो गए।
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जिले में 16 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र तथा 50 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र स्थापित हैं। 30 हजार ग्रामीणों को उनके नजदीक इलाज के लिए पीएचसी का निर्माण वर्ष 2006 से 2010 के मध्य कराया गया था। इन पर सरकार ने करीब 15 करोड़ रुपए खर्च किए थे। चार बेड के इस अस्पताल में डॉक्टर, फार्मासिस्ट सहित अन्य कर्मचारियों की लिखापढ़ी में तैनाती है पर इन अस्पतालों में कोई आता जाता नहीं है। यदि अस्पतालों का संचालन होता तो जंगल व झाड़ियों के बीच ये केंद्र खंडहर के स्वरूप में तब्दील न हुए होते। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र रांगी की स्थापना को करीब 20 साल से अधिक हो गया लेकिन यहां आज तक एक भी मरीज का इलाज नहीं हुआ। पीएचसी परास पर आज भी कुछ लोगों का कब्जा है। पीएचसी भुलईडीह, मुंडेरवा, दुबहा बाजार, देवापिसया, पूरे बहोरी, त्योरासी, पकड़ी, सोनौली मोहम्मदपुर, मंगुरा बाजार, घारीघाट, खम्हरिया, इमलियामिश्र, श्रीनगर बाबागंज, तुलसीपुर माझा, टिकरी, तामापार सहित 25 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पूरी तरह से बंद हैं। इनकी दशा देखकर ही अंदाजा जो जाएगा कि यहां इलाज तो दूर यहां कोई रहता तक नहीं है।
कहीं फामासिस्ट कर रहा इलाज तो कहीं पेयजल की सुविधा नहीं
बालपुर पीएचसी का निर्माण वर्ष 2006 में हुआ था। लेकिन इन 14 वर्षों में एक भी महिला की डिलीवरी नहीं हुई। अस्पताल परिसर में झाड़झंखाड़ लगे हैं। यहां पीने के लिए लगी टंकी में आज तक पानी ही नहीं आया। यहां दिन में केवल एक फार्मास्स्टि आता है और खानापूर्ति कर चला जाता है। कटरा बाजार सीएचसी अंतर्गत तीन पीएचसी है। दुबहा बाजार व पूरे बहोरी में केवल एक फार्मासिस्ट की तैनाती है। केवल खेमपुर में एक आयुष डॉक्टर की तैनाती है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टर ही नहीं हैं। इस पीएचसी का निर्माण करीब 15 साल पहले करीब 39 लाख रुपए से हुआ था। यहां जिन फार्मासिस्ट की तैनाती है उसे कोविड अस्पताल में लगा दिया गया है। यहां पूरी तरह से बंदी है। झिलाही पीएचसी का भवन जर्जर हो चुका है। तामापार पीएचसी में पेयजल की सुविधा ही नहीं है। दतौली पीएचसी की पानी टंकी टूटी है। गंदगी का अंबार है। विद्यानगर पीएचसी में बिजली व वाटर सप्लाई का कनेक्शन तक नहीं है। बैजपुर पीएचसी में पानी के लिए बनी टंकी बेकार है। इसमें बिजली का संयोजन तक नहीं है। यहां तक कि यहां जाने के लिए पगडंडी ही है। पंडरी कृपाल के मुंडेरवा पीएचसी का संचालन ही नहीं हुआ। यहां बनी पानी टंकी बनने के बाद से ही इसमें पानी का सप्लाई नहीं हुआ। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्रित्व काल में जिले के रमापति शास्त्री स्वास्थ्य मंत्री थे। उस समय उन्होंने रांगी अस्पताल का निर्माण व उद्घाटन किया था। तब से यह चला ही नहीं। परास पट्टी में बने पीएचसी पर दबंगों ने कब्जा कर लिया।
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लिखापढ़ी में पांच पीएचसी पर नहीं है डॉक्टर की तैनाती
भुलईडीह, भोरहा, बनगाई, पूरे तिवारी तथा वीरपुर में किसी डॉक्टर की तैनाती नहीं है। ये पांच प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बंद चल रहे हैं। यहां तालाबंदी के कारण अस्पताल के चारों तरफ जंगली घासें उगी हैं और भवन जर्जर हो चुके हैं। यहां चिकित्सा सेवा पूरी तरह ठप है।
लापरवाही बर्दाश्त नहीं
कोविड-19 जैसी इमरजेंसी के हालात में सभी सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्रों और प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर डॉक्टरों और अन्य स्टाफ की उपलब्धता आवश्यक है। जिले में सभी पीएचसी पर भी कोविड हेल्प डेस्क की स्थापना की जानी है। ऐसे में लापरवाही भारी पड़ेगी। गोंडा में ग्रामीण और नगर क्षेत्रों को मिलाकर कुल 52 पीएचसी हैं। अगर कुछ पीएचसी खुल नहीं रही है तो ये लापरवाही बर्दाश्त नहीं होगी। सीएमओ से इस बारे में बात की जायेगी कि आखिर क्यों लापरवाही हो रही है। डॉक्टरों की कमी पूरी मंडल में है इसलिए स्वीकृत पदों के सापेक्ष हर जगह नियुक्त नहीं है। -डॉ. अशोक कुमार गुप्ता, अपर निदेशक स्वास्थ्य, देवीपाटन मंडल
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