गोंडा। खेत में बचा देसी बीज हो या गांव का पुराना तालाब, औषधीय पौधे हों या पीढ़ियों से चला आ रहा पारंपरिक ज्ञान... अब इनकी पहचान गांव में ही दर्ज की जाएगी। जैव विविधता को सहेजने के लिए बुधवार को जिला ग्रामीण विकास संस्थान में ग्राम स्तरीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों (बीएमसी) के सशक्तीकरण के लिए प्रशिक्षण हुआ। इसमें 21 पंचायत सचिव और 19 ग्राम प्रधानों समेत 40 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया।
कार्यक्रम की शुरुआत जिला विकास अधिकारी डॉ. आदित्य तिवारी ने दीप प्रज्ज्वलित कर की। उन्होंने कहा कि जैव विविधता का संरक्षण पर्यावरणीय संतुलन के साथ ही सतत विकास के लिए भी जरूरी है। एनआईआरडीपीआर हैदराबाद की असिस्टेंट प्रोफेसर वीजी नित्या ने प्रधानों और सचिवों को पीपुल्स बायोडायवर्सिटी रजिस्टर (पीबीआर) की उपयोगिता बताई। उन्होंने गांव में उपलब्ध जैव संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान को दर्ज करने की प्रक्रिया समझाई।
उत्तर प्रदेश जैव विविधता बोर्ड के टेक्निकल ऑफिसर डॉ. सोमेश गुप्ता ने जैव विविधता अधिनियम, बीएमसी के गठन और उसके दायित्वों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ग्राम स्तरीय जैव विविधता प्रबंधन समितियों का गठन किया गया है। वन विभाग के क्षेत्रीय वन अधिकारी ने वन्यजीव संरक्षण और गांवों में हरित आवरण बढ़ाने में पंचायतों की भूमिका बताई।
जिला प्रशिक्षण अधिकारी अभिषेक मणि त्रिपाठी ने कहा कि देशी बीज और स्थानीय फसलें भी गांव की जैव विरासत हैं। बीएमसी को सक्रिय रखते हुए पीबीआर तैयार करने पर जोर दिया गया। कार्यक्रम में प्रधान संघ जिलाध्यक्ष उमापति त्रिपाठी, विवेक शुक्ल समेत अन्य लोग मौजूद रहे।