गोंडा। इंडियन बैंक इंप्लाइज क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड में 3.60 करोड़ रुपये की वित्तीय अनियमितता ने जिले की बैंकिंग व्यवस्था और निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामला केवल एक वित्तीय अनियमितता का नहीं, बल्कि 1997 से 2020 तक की उस लंबी चुप्पी का है, जिससे घोटाले की रकम बढ़ती रही और जिम्मेदार कार्रवाई से बचते रहे।
सूत्रों के अनुसार, वर्ष 1997 में सोसाइटी में अनियमितताओं की शुरुआत हुई। तब इसे सामान्य वित्तीय गड़बड़ी समझकर अनदेखा किया गया लेकिन समय के साथ घोटाले का दायरा बढ़ता गया। आरोप है कि वर्षों तक सोसाइटी के खातों से धनराशि के हेरफेर की प्रक्रिया चलती रही और सिस्टम के भीतर मौजूद लोगों की भूमिका संदिग्ध बनी रही। धीरे-धीरे यह रकम बढ़कर 3.60 करोड़ रुपये से अधिक हो गई। ब्याज जोड़ने के बाद यह आंकड़ा लगभग 4.90 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात सामने आई है।
कार्रवाई के बजाय रकम लौटाने का लिया आश्वासन
विभागीय सूत्रों के अनुसार शुरुआती स्तर पर जब अनियमितताओं के संकेत मिले, तब कठोर कार्रवाई की बजाय राशि वापस कराने के लिखित वादों के जरिये मामले को आगे बढ़ने दिया गया। यही वह बिंदु माना जा रहा है, जहां जांच की गंभीरता कमजोर पड़ती दिखाई देती है। इसी बीच आरोपियों से धनराशि लौटाने के आश्वासन लिए गए लेकिन समय बीतने के बावजूद अपेक्षित वसूली नहीं हो सकी। नतीजा यह हुआ कि मामला धीरे-धीरे दबता चला गया और फाइलें आगे बढ़ती रहीं। मामला तब निर्णायक मोड़ पर पहुंचा जब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर नगर कोतवाली में एफआईआर दर्ज हुई। इसके बाद पुलिस ने जांच शुरू कर दी है। पूरे रिकॉर्ड, लेन-देन और पुराने दस्तावेजों की छानबीन की तैयारी की जा रही है।
बैंकिंग सिस्टम की निगरानी पर सवाल
इस प्रकरण ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर 23 वर्ष तक कथित अनियमितताएं कैसे बिना रोक-टोक चलती रहीं। बैंकिंग व्यवस्था में आंतरिक ऑडिट, बाहरी निरीक्षण और प्रशासनिक निगरानी के बावजूद यह मामला वर्षों तक अनदेखा क्यों रहा। यह अब जांच का अहम बिंदु माना जा रहा है। सीओ सिटी आनंद राय कहते हैं कि एफआईआर दर्ज कर ली गई है। नगर कोतवाली पुलिस हर बिंदु की पड़ताल करेगी।