इसमें से करीब 14 प्रत्याशियों को जीत मिली लेकिन पांच सीट ऐसी थी जिस पर जीत पक्की मानी जा रही थी वह भी निकल गई। दुबहा बाजार से भाजपा के जिलाउपाध्यक्ष जसवंतलाल सोनकर को समर्थित प्रत्याशी बनाया गया था। इस पर पार्टी के ही कुछ लोग दूसरे प्रत्याशी के नाम की घोषणा करते रहे। लेकिन संगठन ने उस नाम को तवज्जो नहीं दिया।
इस पर संगठन व एक माननीय जसवंत लाल सोनकर के विरोध में दूसरे निर्दल प्रत्याशी के समर्थन में प्रचार करने लगे। नतीजा जसवंत लाल सोनकर रनर प्रत्याशी ही बन कर रह गए। इसी तरह धनावा जिला पंचायत सीट से रमेश ओझा को समर्थित प्रत्याशी बनाया गया था।
लेकिन यहां सिद्धनाथ निषाद के पक्ष में पार्टी के लोगों ने प्रचार किया और रमेश चुनाव हारकर दूसरे स्थान पर पहुंच गए। पंडरी कृपाल पश्चिमी से भाजपा ने लीलावती को प्रत्याशी बनाया था। लेकिन यहां पार्टी के लोगों ने कांग्रेस के पदाधिकारी की पत्नी के समर्थन में प्रचार किया।
इसी तरह मुजेहना में भाजपा समर्थित प्रत्याशी ममता मिश्रा को बनाया गया था लेकिन यहां भी पार्टी के कद्दावर नेता ने विरोध कर दिया और राम उदार वर्मा का प्रचार किया। लिहाजा यह सीट भी भाजपा के हाथ से निकल गई।
वजीरगंज दक्षिणी से राम कृपाल सिंह को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया था लेकिन इनका पर्चा ही उठवा दिया गया। भदुआ तरहर से भाजयुमो के जिलाध्यक्ष नीरज मौर्य के विरोध में भी प्रचार कर बृजेश जायसवाल को जिताने की कोशिश की गई लेकिन यहां नीरज मौर्य ने अपने प्रयास पर ही चुनाव फतह कर लिया।
भाजपा के भितरघात का परिणाम यह रहा कि करीब पांच सीटें हाथ से निकल गईं और अब अंदर ही अंदर इसकी सुगबुगाहट शुरू हो गई है। संगठन के पदाधिकारी इस पर मौन साधे हैं। वे बोलने को तैयार नहीं हैं लेकिन यह मानते हैं कि भितरघात हुआ है।