जिले से हर बार अमरनाथ यात्रा पर जाने वाले करीब 150 यात्री सोमवार को सकुशल लौट आए। यहां पहुंचे यात्रियों ने कश्मीर में चल रहे भयंकर उपद्रव के बीच किस तरह यात्रा संपन्न की और सेना तथा बाहर के लोगों ने मदद की, उसका आंखाें देखा हाल बयां किया। उन्होंने कहा कि सेना की बदौलत ही वे सब सकुशल लौट सके।
बीती आठ जुलाई को यहां से करीब 150 श्रद्धालु जम्मू कश्मीर के लिए रवाना हुए। भगवान शिव की आराधना व बम भोले के जयकारे लगाते हुए जब ये सभी लोग जम्मू पहुंचे तो वहां तक सब कुछ शांत रहा। लेकिन कश्मीर में आतंकवादी बुरहान के मारे जाने के बाद मचे उपद्रव के कारण सभी को बलटाल में तीन दिन गुजारने पड़े।
यात्रा कर वापस लौटे जानकीनगर के सुरेश चंद्र मिश्र, राजेश तिवारी, पाटेश्वरी शुक्ल, दद्दू शुक्ल, श्रीप्रकाश पांडेय, अवधेश नरायन, मून पांडेय ने बताया कि उन लोगों की यात्रा बहुत दुखदायी रही। यदि बाहर के लोग वहां अपना खानपान का स्टाल न लगाए होते तो लोग भूखे मर जाते। राजेश तिवारी ने बताया कि सबसे कठिन यात्रा बनिहाल से मनीग्राम तक की रही। करीब 200 किलोमीटर की दूरी का सफर तय करने में कई जगह अवरोध उत्पन्न किए गए।
कई जगह उपद्रवियों ने सड़क पर पत्थर डाल कर यात्रा रोकने की कोशिश की, तो कई जगह सड़क पर पेड़ काट कर डाल दिए गए। कश्मीर के स्थानीय लोगों ने जो टेंट लगाए थे, उसमें एक चारपाई का किराया एक रात का 600 रुपये तक लिया।
दो दिन रुकने के लिए 3200 रुपये तक मांग करते रहे। पांच रुपये का बिस्कुट 10 व 20 रुपये में खरीदना पड़ा। एक बाल्टी पानी नहाने के लिए 60 रुपये तथा एक बोतल पानी के लिए 50 रुपये देने पड़े। इतना ही नहीं, भूख के चलते यात्रियों को केला खरीदने पड़े तो 100 रुपये दर्जन केला मिले।
यात्रियों ने कहा कि जम्मू में सरकार का कोई मतलब नहीं है। वहां की पुलिस लापरवाह है। यदि सेना के जवान न होते तो कोई वहां से बचकर नहीं आता। यात्रियों ने बताया कि बनिहाल से मनीग्राम तक उपद्रव को देखते हुए सेना के जवानों ने मोर्चा संभाला हुआ था।
बनिहान से लेकर मनीग्राम तक सेना के जवान सड़क के दोनों छोर पर दीवार बन कर खड़े थे। चप्पे-चप्पे पर सेना के जवानों ने यात्रियों की मदद की। इसके बाद पंजाब व अन्य प्रांतों से जिन लोगों ने लंगर लगाए थे, उन्होंने मुफ्त में भोजन उपलब्ध कराया।