खतरे के निशान को पार करने के बाद मंगलवार को घाघरा नदी का जलस्तर घटना शुरू हो गया है। हर पांच घंटे के अंतराल पर नदी का जलस्तर तीन सेंटीमीटर कम हो रहा है। अब जलस्तर घटने से कटान की आशंका से ग्रामीण सहमें हुए हैं। लोगों की मानें तो घाघरा नदी का जलस्तर घटने और बढ़ने से कटान की आशंका बढ़ जाती है।
प्रशासन ने इसे देखते हुए बांध बचाव का कार्य और तेज कर दिया है। हालांकि, बंधे की पुख्ता सुरक्षा के लिए किसी तरह के कोई ठोस इंतजाम नहीं किए गए हैं। मंगलवार सुबह जलस्तर घटने से घाघरा खतरे के निशान से नीचे आ गई है। सुबह आठ बजे नदी खतरे के निशान से 106.07 से 105.976 मीटर पर पहुंच गई।
दोपहर एक बजे उसका जलस्तर घटकर 105.946 हो गया। नदी के जलस्तर में आ रही इस गिरावट के साथ ही बंधे में कटान का खतरा भी काफी बढ़ा है। जानकारों की माने तो पानी के घटने पर नदी तेजी के साथ कटान करना प्रारंभ कर देती है, जिसे रोकपाना मुश्किल हो जाता है। यही नहीं, नदी का पानी जमीन की गहराई में जाकर कटान करते हुए कटान की सारी मिट्टी लाकर ऊपर पलट देती है। जिससे लोगों के मन में उठने वाली तरह-तरह की आशंकाएं खत्म होने का नाम नहीं ले रहीं।
हालांकि प्रशासन हरेक स्थिति से निपटने के लिए पुख्ता इंतजाम का दावा कर रहा है। करनैलगंज इलाके की सारी बाढ़ चौकियों को अलर्ट पर रखा गया है। बाढ़ के मद्देनजर लोगों के रहने-ठहरने से लेकर अन्य इंतजाम भी पुख्ता कर लिए गए हैं। नदी के मुहाने पर बसे गांव के लोग अब भी बंधे पर शरणार्थियों की तरह जीवन-यापन को मजबूर हैं। जिनकी कोई सुध लेने वाला नहीं है।
सहायक अभियंता अशोक कुमार कहते हैं बांध को बचाने का प्रयास जारी है। उन्होंने बताया कि नदी का जलस्तर घट रहा है, जिसे थोड़ी बहुत कटान होना लाजिमी है। बंधे को कोई खतरा न हो, इसके लिए प्रयास तेज कर दिए हैं।
वहीं, बांध को बचाने के नाम पर बड़े पैमाने पर सरकारी धन का दुरुपयोग किया गया हैं। नदी की धारा को मोड़ने के लिए नई तकनीक से स्पर के नोज बनाने व उसके मरम्मत पर करोड़ों रुपये व्यय किए गए। लेकिन समय से कार्यदायी संस्था को धन ही नहीं मुहैया करवाया गया। पैसों की अनुपलब्धता के कारण जियो ट्यूब में बालू भरने के लिए सिर्फ एक-दो हाइमर मशीनें ही लगाई गईं।
जिससे जियोट्यूब में बालू भरने का काम रफ्तार नहीं पकड़ सका। नतीजा यह हुआ कि बाढ़ आने पर आधे-अधूूरे बने स्पर घाघरा में समा गए। अधिकारियों की नई तकनीक के साथ गरीबों के हिस्से का सरकारी धन नदी में बह गया। उसके बाद बांध को बचाने के नाम पर शुरू हुआ बंदरबांट का खेल अब भी जारी है।
एक तरफ जहां बांध को बचाने के लिए चार विशेषज्ञों की टीम काम रही है तो दूसरी तरफ विभाग के अधिकारी भी अपने कर्मचारियों के साथ पूरी तनमयता के साथ जुटे है। फिर भी नदी की कटान को नही रोक पा रहे हैं।