मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं जिनके सपनों में जान होती है, पंख से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है। इन पंक्तियों को दृष्टिबाधित युवक राजन ने सच कर दिखाया है। दृष्टिहीन होने के बावजूद इंटर का छात्र राजन कंप्यूटर और मोबाइल में दक्ष होने के साथ जूडो में भी माहिर है। हाल ही में युवक ने जूडो की राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में तीन गोल्ड मेडल जीते हें।
हलधरमऊ क्षेत्र के रहने वाले हनुमान सिंह के घर करीब 18 वर्ष पहले जब बेटे का जन्म हुआ तो खुशियाें की जगह पूरा परिवार रंज में डूब गया था। कारण था कि बेटा जन्म से ही दृष्टिहीन था।
हनुमान सिंह बताते हैं कि दृष्टिहीन होने के बावजूद बेटे राजन उर्फ बाबू में किसी भी काम को सीखने की जबरदस्त क्षमता है। बेटे के इसी गुण को देखकर हनुमान ने कुदरत की इस नाइंसाफी से लड़ने का फैसला कर लिया।
हनुमान के मुताबिक राजन को पांच वर्ष की उम्र में लखनऊ के दृष्टिबाधित राजकीय इंटर कॉलेज में दाखिल करा दिया। शिक्षकों ने राजन की प्रतिभा को पहचाना और कक्षा आठ पास करने के बाद उसे जूडो का प्रशिक्षण दिलाना शुरू कर दिया। राजन ने बहुत कम समय में जूडो में ऑरेंज बेल्ट हासिल कर ली।
वर्ष 2014 में राजन ने लखनऊ में दृष्टिबाधित बच्चों की जूडो प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल हासिल किया। वह दिल्ली व गोवा में हुई दृष्टिबाधित बच्चों की जूडो प्रतियोगिता में भी गोल्ड मेडल जीत चुका है। राजन की इस सफलता से प्रभावित होकर राज्यपाल राम नाईक ने भी उसे पुरस्कृत किया है। राजन पढ़ाई के बाद नौकरी करना चाहता है।
राष्ट्रीय स्तर पर तीन गोल्ड मेडल जीतने के बाद उसकी प्रतिभा को देखते हुए वर्ष 2015 में जापान में होने वाली दृष्टिबाधित जूडो कराटे प्रतियोगिता के लिए उसका चयन किया गया था, लेकिन पासपोर्ट न होने से वह ऐन वक्त पर जापान नहीं जा सका। राजन को जापान न जा पाने का मलाल आज भी है।