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कुटिला नदी के किनारे गूंज रहा बगुलों का कलरव

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नवाबगंज (गोंडा)। बगुलों को किसानों का मित्र कहा जाता है। खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीड़े मकोड़े इनका मुख्य भोजन होते हैं। जिससे किसानों का काफी नुकसान बच जाता है। बगुले पूरे भारत में बहुतायत में पाये जाते हैं। फिलहाल इनके प्रजाति पर कोई खतरा नहीं है। कुटिला नदी के किनारे बडे़ पैमाने पर पाए जाने वाले जंगल जलेबी का पेड़ बगुलों को भा गया है।
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कुटिला नदी के तट पर बड़ी तदात में जंगल जलेबी के पेड़ों पर बगुलों नें अपना आशियाना बना रखा है। यहो पीने के लिए पर्याप्त पानी के साथ नदी में पाई जाने वाली छोटे आकार की मछलियां, कीड़े- मकोड़ों के रूप में भोज्य पदार्थ तथा प्रजनन के लिए घोसला बनाने का माहौल अनुकूल साबित हो रहा है।
मानसून काल में बगुले प्रजनन करते हैं। प्रजनन के लिए जून, जुलाई का समय सबसे उपयुक्त रहता है। सुरक्षा के कारण यह कंटीले पेड़ों पर समूह में घोसला बनाते हैं, जिससे मांसाहारी पक्षी व अन्य जीवों से इनके अंडे और बच्चों की सुरक्षा हो जाती है। ऐसे में गोंडा जिले के शिवदयालगंज से अयोध्या जाने वाले मार्ग पर कटराभोगचंद ग्राम पंचायत के टेढ़ी नदी के किनारे लगे जंगल जलेबी के पेड़ों पर इनके कलरव को देखा जा सकता है।
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जंगल जलेबी के कटीले झाड़ बगुलों के लिए पूरे कुनबे की सुरक्षा के नजरिये से उपयुक्त होता है। आमतौर पर सफेद रंग के बगुलों की गर्दन इन दिनों हल्की पीली होती हैं। बरसात के साथ ही इनका रंग सफेद हो जाता है। पक्षी विशेषज्ञ आजाद सिंह की मानें तो कैटल इग्रेट यानी बगुलों के प्रजनन का यह समय उपयुक्त है। कालोनी बिल्डिंग की प्रवृत्ति के कारण समूह में बगुले घोसला बना कर प्रजनन करते हैं। इस इलाके में इनके लिए पर्याप्त आहार उपलब्ध होने के कारण प्रजनन के लिए मादा बगुलों के संग नर बगुले इस इलाके में ठिकाना बनाते हैं। ये मछलियों के अलावा कीड़े मकोड़े, गाय, भैंस के शरीर में पलने वाली किलनी खाकर प्रकृति को स्वच्छ बनाते हैं।
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