गोंडा। महज 24,107 रुपये बकाया रकम की रिकवरी के लिए जमीन नीलामी के मामले में 34 साल बाद भूस्वामी को हाईकोर्ट से न्याय मिल गया है। नियमों को ताख पर रखकर मनमाने ढंग से भूमि की नीलामी को निरस्त करते हुए कोर्ट ने विक्रय कर अधिकारी को भूमि का सही मूल्यांकन और प्रचार कराकर छह माह में नीलामी कराने का आदेश दिया है।
वर्ष 1991 में अविभाजित गोंडा जिले (अब बलरामपुर) के रहने वाले मोहम्मद जमील पर 24,106 रुपये सेल्स टैक्स की बकाएदारी थी। वह अदा नहीं कर पाए तो विभाग ने जिला प्रशासन को वसूली प्रमाणपत्र भेज दिया। बकाया वसूल न होने पर प्रशासन ने मोहम्मद जमील की महदेइया मोड़ स्थित जमीन के छह गाटों की नीलामी शुरू कर दी। 25 नवंबर 1991 को नीलामी के दौरान तहसीलदार ने उच्च बोलीदाता के पक्ष में बोली फाइनल कर दी। तीन जनवरी 1992 को उपजिलाधिकारी उतरौला ने नीलामी की पुष्टि की। जबकि पांच सितंबर 1991 को विक्रय कर अधिकारी ने आरसी वापस लेने का आदेश दे दिया था। अफसरों के न सुनने पर मोहम्मद जमील ने 23 दिसंबर 1992 को आयुक्त फैजाबाद को प्रार्थनापत्र दिया। 22 अप्रैल 1993 को उनकी अर्जी खारिज हो गई। इसके बाद उन्होंने राजस्व परिषद में निगरानी दायर कर न्याय की गुहार लगाई।
सात फरवरी 1996 को निगरानी भी खारिज हो गई तो उन्होंने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खंडपीठ में याचिका दायर की। याची के अधिवक्ता ने कहा कि जो जमीन मात्र 38,637 रुपये में नीलाम की गई है, उसकी वास्तविक कीमत डेढ़ लाख रुपये है। नीलाम अधिकारी ने नीलामी के संबंध में न तो किसी अखबार में प्रकाशन कराया और न ही क्षेत्र में डुग्गी मुनादी की गई। इसके अतिरिक्त नीलामी संपन्न होने के बाद बोलीदाता ने नियमानुसार निर्धारित समयावधि 15 दिन में कुल धनराशि जमा नहीं की।
24 नवंबर 2025 को सुनवाई के दौरान सभी पक्षों के अधिवक्ताओं की बहस, मामले के तथ्य व साक्ष्य पर विचार करते हुए न्यायमूर्ति इरशाद अली ने याचिका स्वीकार कर ली और नीलामी प्रक्रिया को निरस्त करने का आदेश दिया। कोर्ट ने विक्रय कर अधिकारी को आदेश दिया है कि संपत्ति का सही मूल्यांकन कराया जाए और समाचारपत्र में प्रकाशन व डुग्गी मनादी कराकर छह माह में नए सिरे से नीलामी प्रक्रिया संपन्न कराई जाए।