ग्रामीण क्षेत्रों से मजदूरों का पलायन रोकने व उन्हें गांव में ही 100 दिन का रोजगार उपलब्ध कराने के निए संचालित मनरेगा का हाल जिले में ठीक नहीं है। इस योजना के तहत मजदूरों को न तो रोजगार मिल रहा है और न ही काम। साथ ही काम करने वाले मजदूरों को उनकी मजदूरी भी नहीं मिल रही है।
हालत यह है कि पिछले वित्तीय वर्ष में इस योजना में काम करने वाले 25 हजार मजदूरों की चार करोड़ 16 लाख रुपये की मजदूरी बकाया है। मजदूरी न मिलने से ये श्रमिक भुगतान के लिए भटक रहे हैं। अधिकतर मनरेगा मजदूरों के बैंक खातों में फीडिंग की गड़बड़ी होने की वजह से भुगतान नहीं हो पा रहा है।
मनरेगा के अंतर्गत जिले के 16 विकास खंडों में कुल तीन लाख 63 हजार 555 मजदूरों ने अपना पंजीकरण करा रखा है, लेकिन पंजीकरण कराने के बावजूद इन मजदूरों को रोजगार नहीं मिल रहा है।
जिन श्रमिकों ने मजदूरी की भी है, उन्हें उसका भुगतान नहीं हो रहा है। इसके अलावा भी तमाम ऐसे मजदूर हैं, जिनका अब तक जॉबकार्ड ही नहीं बन सका है। ऐसे मजदूर रोजगार की तलाश में गांवों से पलायन करने को मजबूर हैं।
वित्तीय वर्ष 2015-16 में पंजीकृत मनरेगा मजदूरों में से प्रशासन महज एक लाख 54 हजार 667 मजदूरों को ही रोजगार उपलब्ध करा सका है जो कि कुल मजदूरों की संख्या का सिर्फ 43 प्रतिशत ही है।
इसमें भी करीब 25 हजार मनरेगा मजदूरों की चार करोड़ 16 लाख रुपये की मजदूरी बकाया है और प्रशासन वित्तीय वर्ष बीतने के बाद भी मजदूरी का भुगतान अब तक नहीं कर सका हैं।
अपनी मेहनत की कमाई के लिए मजदूर ब्लॉक से लेकर जिले स्तर तक के अधिकारियों का चक्कर काट रहे हैं, लेकिन भुगतान नहीं हो रहा है। काम करने के बाद मजदूरी न मिलने से मजदूरों की रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो रही है और उनका इस योजना से मोहभंग हो रहा है।
मनरेगा में काम करने वाले मजदूर का मस्टर रोल काम समाप्त होने के बाद भुगतान के लिए ब्लॉक के लेखाकार के पास भेजा जाता है। लेखाकार के डोंगल लगने के बाद मस्टर रोल पर खंड विकास अधिकारी का डोंगल लगाना होता है। दोनो डोंगल लग जाने पर 15 दिनों के भीतर मनरेगा मजदूर के बैंक खाते में उसकी मजदूरी भेजे जाने का नियम है।