गोंडा। देवीपाटन मुख्यालय स्थित बाबू ईश्वर शरण चिकित्सालय में अव्यवस्थाओं का सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। चिकित्सकों की निजी प्रैक्टिस, अनुपस्थिति व स्वास्थ्यकर्मिर्यों की लापरवाही जैसे कई दर्द हैं, जिनका दंश यहां आने वाले मरीजों को हर साल झेलना पड़ रहा है। हालत यह हैं कि यहां दम टूटे तो टूटे लेकिन समस्याओं की कतार कभी नहीं टूटती है। यही कारण है कि आने वाले मरीज घुट-घुट कर मरने के लिए विवश हो रहे हैं। 39 लाख आबादी को इलाज मुहैया कराने का दावा करने वाले इस अस्पताल में सोमवार को अमर उजाला ने इलाज का सच जानने का प्रयास किया तो हकीकत चौंकाने वाली नजर आई। पेश है पवन कुमार मिश्र की रिपोर्ट-
पर्चा कटाने से ही शुरू हो जाती हैं दुश्वारियां
जिला अस्पताल में पर्चा कटाने से ही दुश्वारियां शुरू हो जाती हैं। पुरुषों की लाइन हो या फिर महिलाओं की, लंबी लाइन देख परेशान व्यक्ति की हिम्मत जवाब दे जाती है। घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद ही पर्चा मिल पाता है। मरीजों की भीड़ को देखते हुए काउंटर कई बनाए गए हैं, लेकिन वह कम ही संचालित किए जाते हैं। यही नहीं सबसे खास बात है कि महिलाओं की कतार में कभी कभार पुरुष भी जुगाड़ लगाते देखे जाते हैं। अपने घर के परिवारीजन को दिखाने आई पूजा सिंह ने बताया कि महिलाओं की कतार में पुरुषों का हस्तक्षेप लोगों को असहज बना देता है। यह शर्मनाक है।
डॉक्टर साहब तक पहुंचना मुश्किल
जिला अस्पताल में पर्चा कटाने के बाद डाक्टर साहब तक पहुंचना मुश्किल हो जाता है। दरवाजे ही मरीजों व तीमारदारों के बीच धक्का मुक्की देखकर परेशान हाल लोगों की हिम्मत जवाब दे जाती हैं। धक्का मुक्की न सह पाने वाले मरीज, लाचार, वृद्ध दूर से ही बैठकर डॉक्टर साहब तक पहुंचने के लिए लड़ते-झगड़ते लोगों का तमाशा देखते रहते हैं फिर काफी देर बाद ही उनका नंबर आता है। कभी कभार तो नंबर ही नहीं आता है और डॉक्टर साहब चले जाते हैं। इलाज कराने आई शकुंतला ने बताया कि भइया जो बैठा रहेगा, उसका नंबर दो बजे तक भी नहीं आएगा फिर अस्पताल बंद हो जाएगा, तब इलाज कैसे होगा। चिकित्सकों के कक्ष के सामने भीड़ इसलिए भी ज्यादा लगती है क्योंकि तैनात चिकित्सकों में कई की कुर्सियां खाली रहती है, ऐसे में जो चिकित्सक मौजूद रहता है, उसके यहां भीड़ बढ़ जाती है।
जांच कराना भी आसान नहीं
जिला अस्पताल में पर्चा कटाने व डॉक्टर साहब को दिखाने के बाद वह जांच लिखते हैं लेकिन क्षेेत्रीय निदान केंद्र में पहुंचते-पहुंचते मरीजों व तीमारदारों की हिम्मत जवाब दे जाती हैं, क्योंकि यहां कोई मरीज कितना ही गंभीर क्यों न हों, नंबर आएगा तभी देखा जाएगा। यह नंबर भी कब आएगा, पता नहीं। सोमवार को मेवातियान से आंत में इंफेक्शन की जांच कराने आए इदरीस बेड पर ही लेटे हुए अपने नंबर का इंतजार करते दिखे। उनके साथ रईस ने बताया कि करीब एक घंटे से खड़े हैं लेकिन अभी तक जांच नहीं हो पाई।
दवा लेने में भी छूट जाता पसीना
पर्चा कटाने, डॉक्टर को दिखाने व जांच कराने में धक्का-मुक्की खाने के बाद दवा लेने में भी मरीजों व तीमारदारों को पसीना छूट जाता है। दवा वितरण के लिए भी कई काउंटर हैं लेकिन संचालित दो ही किए जाते हैं, ऐसे में लंबी कतार में खड़े होकर लोगों को लाल पीली टिकिया ही नसीब हो पाती है जिसे खाने के बाद राहत मिल जाए, इसकी उम्मीद कम ही दिखती है।
इलाज में लापरवाही बर्दाश्त नहीं
गर्मी के चलते मरीजों की संख्या बढ़ गई है जिससे काफी परेशानी हो रही है। चिकित्सकों की संख्या कम होने के संबंध में शासन को पत्र लिखा गया है। अस्पताल यदि नई बिल्डिंग में संचालित हो जाए तो समस्या कम हो जाएगी। बिल्डिंग हैंडओवर के लिए प्रयास किया जा रहा है। सभी चिकित्सकों व स्वास्थ्य कर्मियों को निर्देश दिया जाएगा कि वह मरीजों व तीमारदारो से सहृदयता से पेश आएं, इलाज में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। -डॉ. रतन कुमार, प्रमुख चिकित्साधीक्षक जिला अस्पताल गोंडा