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कॉपी-किताब की बढ़ी कीमतों ने उड़ाए होश

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गाजीपुर/मौधा। अप्रैल से नया शैक्षिक सत्र शुरू हो गया है। निजी स्कूलों की फीस ने अभिभावकों की जेब पर पहले से ही बोझ डाल रखा था। अब कॉपी-किताबों की 20 से 30 फीसदी तक बढ़ी कीमतों ने उनके होश उड़ा दिए हैं। ऐसे में लोगों ने सरकार से कॉपी-किताबों को पूरी तरह से कर मुक्त कर देने की मांग की है।
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कोरोना महामारी के चलते लगभग दो वर्षों से बंद पड़े विद्यालय अब गुलजार हो गए हैं। अपने बच्चों के लिए कॉपी-किताबों के साथ ही स्टेशनरी के अन्य सामान खरीदने के लिए दुकानों पर अभिभावकों की भीड़ लग रही है। वहां पहुंचकर बढ़ी किताब कॉपी की कीमतें उनके होश उड़ा रही है। वजह अधिकांश प्राइवेट स्कूलों ने निजी प्रकाशकों के साथ मिलकर अभिभावकों को चपत लगाने का काम शुरू कर दिया है। हालत यह है कि जिन स्कूलों को बच्चों के लिए एनसीईआरटी की किताबें लगानी चाहिए, वे भी निजी प्रकाशकों की किताबें पढ़ाने को मजबूर कर रहे हैं। प्रकाशकों की ओर से स्कूलों को मोटा कमीशन दिया जा रहा है। ऐसे में अभिभावकों को नर्सरी के बच्चों की किताबों के लिए 1500-2000, तो एलकेजी-यूकेजी के लिए दो से तीन हजार, पहली कक्षा के लिए तीन से साढ़े चार, दूसरी के लिए तीन से पांच हजार, तीसरी के लिए साढ़े तीन से साढ़े पांच, कक्षा चार के लिए चार से छह हजार तक खर्च करना पड़ रहा है। यही नहीं ऊपर की कक्षाओं के लिए पांच से दस हजार तक खर्च करना पड़ रहा है। कुछ अभिभावकों का कहना है कि अधिकांश स्कूल किताबों के अलावा कापियों पर भी अच्छा खासा पैसा कमाते हैं।
महंगाई हर ओर आंख दिखा रही है। राशन, सब्जी, तेल और दाल से लेकर कॉपी-किताबों पर भी महंगाई का कब्जा हो चुका है। अब तो आम जीवन का ही चलना मुश्किल होने लगा है- गुलाम गौस
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अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों ने भी महंगाई की दुहाई देकर फीस में 25-30 फीसदी बढ़ोत्तरी की थी। अब कॉपी-किताबों की बढ़ी कीमतों ने अधिकांश अभिभावकों का हौसला पस्त कर दिया है- अजीत पांडेय
सामान्य व्यक्तियों के लिए अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना आसान नहीं है। भारी-भरकम फीस के अलावा महंगी कॉपी, किताब खरीदना भी अब आम आदमी के वश में नहीं है। इसलिए सरकार इस पर रोक लगाए- संजय सिंह
सरकारी स्कूलों में बेहतर शिक्षा न मिलने के कारण हम बच्चों का दाखिला निजी स्कूलों में कराते हैं लेकिन शिक्षा के नाम पर वहां कारोबार किया जाता है। महंगे दामों में निजी प्रकाशन की किताबें बेची जाती हैं- कन्हैया पांडेय
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