हजरत शाहनिंद पीर गाजी रहमतुल्ला अलैह का 716 वां सालाना उर्स 19 अप्रैल को मनाया जाएगा। इस मौके पर समाज के हर तबके के अकीदतमंद शामिल होकर मत्था टेकते हैं। मान्यता है कि पीर बाबा की मजार पर सच्चे मन से मांगी मन्नतें जरूर पूरी होती हैं।
कस्बा मुहम्मदाबाद व आसपास केे क्षेत्रों के जितने बुजुर्गाने दीन है उनमें हजरत शाहनिंद गाजी का दर्जा सबसे ऊंचा है। मुखतलिफ रवायतों के मुताबिक शाहनिंद पीर गाजी अपने पांच भाईयों के साथ इमराह बोखारा से चलकर गाजीपुर पहुंचे और गंगा के किनारे कस्बा मुहम्मदाबाद में सकुनत अख्तियार किया। सुफियाए कराम के मुताबिक उस जमाने में सती होने का रिवाज था।
हजरत शाहनिंद पीर के मजार से लगभग दो फंर्लाग की दूरी पर झाड़ियों के बीच आज भी जयारतगाह की शकल में स्थान मौजूद है। इनके जीवन काल संबंधी कई लोक कथाएं प्रचलित हैं। कहा जाता है कि एक बार एक व्यापारी दो घोड़े लेकर उन्हें बेचने निकला। घोड़ा नहीं बिका तो उसने बाबा से मन्नत मांगी कि हमारे दो घोड़े एक सौ रुपये में बिक जाएं तो वह प्रसाद चढ़ाएगा। व्यापारी वहीं सो गया।
तभी एक चोर आया और उसने मन्नत मांगी कि बाबा एक घोड़ा चुराकर बेचने में सफल रहे तो प्रसाद चढ़ाएंगे और उसने एक घोड़ा चुरा लिया। व्यापारी सुबह उठा तो देखा कि उसका एक घोड़ा गायब है। व्यापारी का एक घोड़ा दो सौ रुपये में बिक गया।
उधर, चोर चुराये एक घोड़े को 50 रुपये में बेचकर प्रसाद चढ़ाने गया और व्यापारी भी। दोनों प्रसाद बाटते समय अपनी मन्नत पूरी होने की बात बताई तो चोर शर्मिदा होकर बाबा की मजार पर गया और माफी मांगी और कभी भी चोरी नहीं करने की कसम खाई। चोर व्यापारी के घोड़े का पैसा देकर फकीर बन गया।
शाहनिन्द पीर बाबा के मजार में प्रत्येक जुमेरात व जुमा के दिन अकीदतमंदों की भीड़ होती है। बाबा का उर्स हर साल रजब की 11 तारीख को होता है।