खेत से चारा लेकर खैराबारी गांव से घर जा रहे वृद्ध रामरूप यादव (65) की बाइक सवार बदमाशों ने गुरुवार की सुबह गोली मारकर हत्या कर दी। एक गोली उनके हाथ में लगी, जबकि दूसरी पीठ को छेदती हुई पेट से निकल गई। रामरूप के
भाई और भतीजे की पहले ही हत्या हो चुकी है। वे भाई की हत्या के चश्मदीद गवाह थे। पुलिस को शक है कि गवाही न दे पाने के लिए ही बदमाशों ने उनकी हत्या कर दी। पुलिस को मौके से नाइम एमएम के दो खोखे मिले हैं जिससे यह
अंदाजा लगाया जा रहा है कि वारदात को पेशेवर बदमाशों ने अंजाम दिया है। खैराबारी गांव निवासी रामरूप यादव गुरुवार की सुबह साढ़े नौ बजे खेत से पशुओं के लिए चारा लेकर साइकल से घर जा रहे थे। जैसे ही वे खेत से सड़क पर पहुंचे
, पीछे से आए बाइक सवार तीन बदमाशों ने उनकी साइकल को टक्कर मार दी। इस पर रामरूप यादव और बाइक सवारों के बीच हाथापाई होने लगी। इसी बीच एक बदमाश के पिस्टल निकालने पर रामरूप खेत की तरफ भागे, लेकिन बदमाशों
ने उन्हें दौड़ाकर दो गोली मार दी। उन्होंने मौके पर ही दम तोड़ दिया। गोली की आवाज सुनकर गांव के लोग मौके पर पहुंचे, मगर तब तक बदमाश फरार हो गए। रामरूप के बड़े भाई रामराज की 24 नवंबर 2014 को हत्या कर दी गई थी
और वे इस वारदात के चश्मदीद गवाह थे। माना जा रहा है कि रामरूप गवाही न दे सकें, इसीलिए उनकी हत्या कर दी गई। रामराज की बहू रीता यादव गांव की प्रधान हैं।
उधर, सूचना मिलते ही भांवरकोल और करीमुद्दीनपुर की पुलिस मौके पर पहुंच गई। पुलिस ने शव को कब्जे में लेना चाहा तो ग्रामीण विरोध करने लगे। वे पुलिस अधिकारी को बुलाने पर अड़े थे। मौके पर पहुंचे पुलिस अधीक्षक वैभव कृष्ण के
समझाने पर ग्रामीण मान गए। वे हत्यारों की गिरफ्तारी, रामरूप के परिवार को सुरक्षा देने की मांग कर रहे थे। एसपी ने रामरूप के पुत्र संतोष को दो और चचेरे भाई संजय यादव को एक सुरक्षा गार्ड उपलब्ध कराने का आश्वासन दिया। करीब
छह घंटे बाद जब उनके बड़े पुत्र सुशील यादव वाराणसी से लौटे तो पुलिस ने शव को कब्जे में लिया। संतोष यादव की तहरीर पर भांवरकोल पुलिस ने तीन अज्ञात और जेल में बंद चार लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है।
पुलिस ने अगर पीडि़त की गुहार पहले सुन ली होती तो शायद रामरूप की हत्या न होती। उनके पुत्र संतोष ने एक जून को पुलिस अधीक्षक को प्रार्थना पत्र देकर सुरक्षा की गुहार लगाई थी। उस समय कप्तान ने सुरक्षा का भरोसा भी दिलाया
था। इस बीच गुरुवार को जब वे मौके पर पहुंचे तो संतोष ने उनसे यही कहा कि अगर आपने सुरक्षा दिला दी होती तो शायद पिता की हत्या न होती। संतोष की व्यथा सुन कप्तान भी कुछ देर के लिए सोच में पड़ गए।