इससे उन्हें भारी लाभ मिलता था। यहां आईसीएस (अब आईएएस) रैंक के अधिकारियों की तैनाती होती थी, जो ओपियन एजेंट (अब जनरल मैनेजर) कहे जाते थे। वह उस समय देश की राजधानी कलकत्ता में बैठने वाले वाइस रैक (जनरल गवर्नर) हेड को सीधे रिपोर्ट करते।
हालांकि चीन ने अत्यधिक अफीम स्टोर होने और वहां के लोगों को लत लगने के कारण लेने से इंकार कर दिए थे, जो जिले से जलमार्ग से कलकत्ता और वहां से चीन एक्सपोर्ट किया जाता था।
बताते हैं कि ब्रिटिश साम्राज्य के 1839 में अफीम व्यापार भी चीन में प्रथम अफीम युद्धों को जन्म दिया था। हालांकि गाजीपुर और आसपास के के जिलों में अफीम की खेती धीरे-धीरे कम होती गई। 1911 में पटना का कारखाना बंद हो गया, लेकिन गाजीपुर की अफीम फैक्ट्री चलती रही। हालांकि यहां कच्चा माल सीधे लिया जाना बंद हो गया।
इस समय राजस्थान के चित्तौड़ और बाराबंकी यूनिट से ओपियम गम गाजीपुर मंगाया जा रहा है। मौजूदा समय में फैक्टरी की क्षमता 60 हजार किलोग्राम चार्ज की है लेकिन पिछले वित्तीय वर्ष में 81 किग्रा चार्ज किया, जो दवाओं में उपयोग किए जाते हैं। कंपनियां च्यवनप्राश, कफ सीरप से लेकर कैंसर के मरीजों को दी जाने वाली दवाएं बनाने तक में इसका उपयोग करती हैं।