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लांसनायक का पार्थिव शरीर आते ही लोगों की आंखें हुई नम

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सादात/भीमापार। सादात थाना क्षेत्र के रामपुर हरिवंश (इटवा) गांव में बुधवार को लांसनायक बालकिशुन यादव का पार्थिव शरीर पैतृक गांव में पहुंचते ही लोगों के आंखों नम हो गईं। पूरा गांव शोक में डूब गया। दिल्ली से साथ में आए सेना के जवानों ने बुधवार को बालकिशुन के पार्थिव शरीर परिजनों को सौंपा, तो परिजन फफक कर रोने लगे। वहां सैकड़ों की संख्या में मौजूद लोगों की आंखों से आंसू बहने लगे। औड़िहार के जौहरगंज स्थित श्मशान घाट पर जवान का अंतिम संस्कार कर दिया गया। मुखाग्नि जवान के पिता सियाराम यादव ने दी।
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पार्थिव शरीर के साथ पहुंचे सेना के लांसनायक वीरेंद्र सिंह ने बताया कि जवान के सम्मान में गार्ड आफ ऑनर दिल्ली में ही दे दिया गया था। बालकिशुन सेना की 116वीं इंजीनियर बटालियन के लांसनायक थे। उनकी तैनाती नागालैंड के दीमापुर जिले में थी। फौज में 11 साल की नौकरी के बाद वह नागालैंड के अलावा जम्मू और अमृतसर में भी तैनात रहे। परिवार वालों की माने तो 35 वर्षीय बालकिशुन पिछले छह माह से ब्लड कैंसर से पीड़ित थे। उनका इलाज दिल्ली के आरआरओ हॉस्पीटल में चल रहा था, जहां इलाज के दौरान उनकी मौत सोमवार की शाम लगभग छह बजे अस्पताल के आईसीयू में हो गई। सेना की तीन सदस्यीय टीम शव लेकर बुधवार की सुबह गांव पहुंचे। इस दौरान जवान की पत्नी रीमा देवी और उनके दो छोटे-छोटे बच्चे रौनक और रिशु शव के साथ आए थे।
लॉकडाउन के चलते भाई नहीं कर सका अंतिम दर्शन
भीमापार। लांसनायक बालकिशुन यादव का पार्थिव शरीर घर आते ही परिजनों और शुभचिंतकों ने अंतिम दर्शन किए। लेकिन जवान के बड़े भाई रामकिशुन यादव लॉकडाउन में फंसने की वजह से अंतिम यात्रा में शामिल नहीं हो सके। यह सबको खलता रहा। अपने चार भाइयों में बालकिशुन तीसरे नंबर पर थे। उनके अंतिम संस्कार के दौरान एक बड़े भाई कन्हैया और छोटे भाई कमलेश तो मौके पर मौजूद थे। लेकिन दूसरे नंबर के बड़े भाई रामकिशुन लाकडाउन की सख्ती के चलते मुंबई में फंसे रह गए।
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अंतिम यात्रा में उमड़ पड़े लोग
भीमापार। लांसनायक बालकिशुन यादव की ससुराल भी उनके घर से महज आठ किलोमीटर दूर निंदीपुर गांव में है। इसलिए वहां भी खबर पहुंचते देर नहीं लगी। दोनों गांवों में शोक की लहर दौड़ गई। इसलिए लॉकडाउन के बाद भी सेना के जवान को श्रद्धांजलि देने वालों का तांता लगा रहा। इस दौरान अपने दो नौनिहालों को लेकर पत्नि रीमा देवी रो-रो कर बेसुध हुए जा रही थी। जबकि माता रामदुलारी बेटे का शव पकड़ कर दहाड़े मार रही थी।
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