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Ghazipur News: यहां हिंदू बनाते हैं ताजिये, मुस्लिमों के साथ करते हैं मातम

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गंगौली स्थित अपने मकान में ताजिया को अंतिम रूप देता राजू खरवार। संवाद
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गंगौली। मुहर्रम आते ही गंगौली गांव की फिजा बदल जाती है। गलियों में या हुसैन की सदाएं गूंजने लगती हैं और मजलिसों का दौर शुरू हो जाता है। खास बात यह है कि यहां मुहर्रम सिर्फ मुस्लिम समुदाय का पर्व नहीं, बल्कि पूरे गांव की साझी विरासत है। हिंदू और मुस्लिम मिलकर ताजिया बनाते हैं, जुलूस निकालते हैं और इमाम हुसैन की शहादत को याद करते हैं।
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कासिमाबाद तहसील मुख्यालय से करीब चार किलोमीटर दूर स्थित गंगौली गांव की कुल आबादी करीब आठ हजार है। इनमें हिंदू और मुस्लिमों की आबादी आधी-आधी है। इनमें 25 घर शिया मुसलमान भी हैं। गांव वर्षों से सांप्रदायिक सौहार्द और गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल बना हुआ है। मशहूर साहित्यकार राही मासूम रजा का पैतृक गांव होने के कारण इसकी पहचान देश-दुनिया तक है। उनके चर्चित उपन्यास आधा गांव में भी इस साझा संस्कृति की झलक मिलती है। गंगौली में मुहर्रम
का यह स्वरूप आज के दौर में भी सामाजिक समरसता की ऐसी मिसाल पेश करता है, जहां रिश्ते मजहब से नहीं, मोहब्बत और विश्वास से तय होते हैं।
25 वर्षों से हिंदू परिवार बना रहा ताजिया
गांव के राजू खरवार पिछले 25 वर्षों से ताजिया बनाने का काम कर रहे हैं। हर वर्ष वह 15 से 20 ताजिए तैयार कर मुस्लिम परिवारों को देते हैं। इतना ही नहीं, अपने परिवार के सहयोग से एक भव्य ताजिया बनाकर इमामबाड़ा चौक पर स्थापित भी करते हैं। राजू बताते हैं कि पिता के निधन के बाद संघर्ष के दिनों में उनकी आस्था मौला अब्बास से जुड़ी। इसके बाद उन्होंने ताजिया बनाना शुरू किया, जो आज एक परंपरा बन चुकी है। इस काम में उनके परिवार के सदस्य कल्लू, आरती, चांद बाबू और जय हिंद भी बराबर की भागीदारी निभाते हैं।
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तीन दशक से निभा रहे भाईचारे की परंपरा
गांव के टूटू वर्मा, अवधेश राजभर, घोड़ा वर्मा और दयाशंकर सहित कई हिंदू परिवार पिछले 30 वर्षों से मुहर्रम के जुलूसों और मातमी कार्यक्रमों में शामिल होते आ रहे हैं। उनके लिए यह धार्मिक आयोजन से अधिक आपसी भाईचारे और सामाजिक एकता का प्रतीक है।
मन्नत पूरी हुई तो 35 साल से कर रहे मातम
गंगौली निवासी राजेश वर्मा की कहानी भी लोगों को भावुक कर देती है। उन्होंने बताया कि संतान प्राप्ति की मन्नत पूरी होने के बाद वह पिछले 35 वर्षों से मुहर्रम में मातम कर रहे हैं। मुहर्रम के दिनों में वह ऑटो चलाना भी बंद कर देते हैं और पूरा समय मजलिसों व जुलूसों में बिताते हैं।
इंसानियत का पैगाम है मुहर्रम
इमाम-ए-जुमा बेंगलुरु व गंगौली के मूल निवासी मौलाना सैय्यद लुकमान हैदर जाफरी ने कहा कि हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी किसी एक धर्म या समुदाय के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए है। मुहर्रम अमन, इंसाफ, भाईचारे और सत्य के लिए संघर्ष का संदेश देता है। उन्होंने कहा कि मजलिस और जुलूस में किसी धर्म या जाति की कोई बंदिश नहीं है। हर वर्ग के लोग इसमें शामिल हो सकते हैं।
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