जिले का रंगमंच का इतिहास काफी संघर्षों का रहा है। वर्ष 1980 में डा.
शिवमूरत सिंह ने माध्यम नाट्य संस्था की स्थापना कर रंगमंच का बीज रोपकर यह
प्रयास कियाकि अंकुरित होकर वह पनपे। लेकिन संसाधनों और लोगों की रुचि के
अभाव में बीज मुरझाकर रह गया। संसाधन और कर्मियों के अभाव के चलते भावों का
प्रस्तुतिकरण थम गया और नाट्यों के आयोजनों की गति धीमी नहीं पड़ी, बल्कि
जिले में समाप्त ही हो गई।
गाजीपुर में सबसे पहले वर्ष 1916 में पंडित
भागवत मिश्र के प्रोत्साहन और सहयोग से पंडित माधव शुक्ल ने हिंदी नाट्य
समिति की स्थापना की थी। वर्ष 1939-40 में जलियांवाला बाग कांड के आधार पर
करंडा के बचई सिंह के नेतृत्व में एक लघु नाटक तैयार कर उसका मंचन किया
गया था। वर्ष 1980 में माध्यम नाट्य संस्था की स्थापना की गई। 4 जनवरी 1981
को रंगमंचीय नाटकों के प्रस्तुतीकरण के साथ रंग आंदोलन की शुरुआत की गई।
माध्यम नाट्य संस्था के संस्थापक होने का श्रेय डा. शिवमूरत सिंह को
प्राप्त हुआ। उन्होंने गाजीपुर में दर्जन भर से ज्यादा नाटकों का आकर्षक
रंगमंचीय प्रस्तुतीकरण किया। पूर्वार्द्ध, महाप्रस्थान, स्कंदगुप्त, गिरीश
कर्नाड की तरफ से रचित तुगलक, धर्मवीर भारती कृत अंधायुग, मोहन राकेश कृत
आषाढ़ का एक दिन, डा. शंभूनाथ सिंह कृत गांधारी, अकेलापन शहर, बादल सरकार
का एवं इंद्रजीत आदि नाटकों का मंचन कर गाजीपुर में रंगमंच को मुकाम प्रदान
किया।
इन प्रयासों के बावजूद जिले में रंगमंच कर्मियों का अभाव बना रहने
से भावों का प्रस्तुतीकरण लगभग थमा ही नहीं बल्कि समाप्त हो गया। विश्व
रंगमंच दिवस के मौके पर डा. सिंह ने खास बातचीत में कहा कि कृषि वैज्ञानिक
कहते हैं कि बंजर भूमि में उपज अच्छी होती है। इसी बात को ध्यान में रखकर
उन्होंने गाजीपुर में रंगमंच का बीज रोपा कि यह अंकुरित होगा लेकिन वह
पनपने के बजाए मुरझा गया।
उनका कहना है कि रंगमंच से सिर्फ बच्चों का ही
नहीं व्यक्तित्व विकास होता है बल्कि बड़ों का आत्मीय विकास भी होता है।
अपनी रंगमंचीय विधा के चलते राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाले डा. सिंह
कहते हैं कि पुरस्कार तो राजनीति देती है। जिले के करंडा विकासखंड के बसंत
पट्टी निवासी एवं स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिंदी विभागाध्यक्ष रह चुके
डा. सिंह जिले में रंगमंच की मौजूदा स्थिति को दयनीय बताते हैं। उनका कहना
है कि अपने इतिहास के प्रति यहां के लोग लापरवाह हैं।