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मां के संघर्षों से बेटी ने हॉकी खिलाड़ी बन पाया मुकाम

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ऐ अंधेरे देख ले, तेरा मुंह काला हो गया। मां ने आंखें खोल दी उजाला हो गया... अपने बच्चों के लिए गरीबी रूपी अंधेरे से संघर्ष करने के लिए शायद हर मां तैयार रहती है। अगर वह अपना धैर्य नहीं छोड़ती और सूझबूझ से काम लेने की हिम्मत रखती है तो उसके घर से अंधेरा भाग जाता है।
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सैदपुर क्षेत्र के करमपुर गांव की निर्जन बस्ती में साधारण परिवार में पली-बढ़ी अन्नू गौड़ अपनी मां राधा के साथ बचपन में बीते मुफलिसी के दिन और गरीबी के संघर्ष को आज मुकाम पाने के बाद भी भुलाए नहीं भूल पाती। अपनी सफलता का श्रेय वह अपनी मां को देती है और बताती है कि मेरे पिता घरभरन की आकस्मिक मौत के बाद मां पर विपत्ति का पहाड़ ही टूट पड़ा था। परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी अब मां के सिर पर आ पड़ी थी। एक छोटा भाई और मेरी जिम्मेदारी वह कैसे निभाएगी यह समस्या उसके सामने मुंह बाए खड़ी थी।
समाज घर परिवार सबसे संघर्ष करते हुए उसने कठिन श्रम के बल पर न केवल दो जून की रोटी जुगाड़ की बल्कि बेटे बेटी को पढ़ाने का जिम्मा भी उठाया। प्राथमिक विद्यालय में पढ़ाई पूरी हो जाने के बाद ठाकुर तेज बहादुर सिंह से मिलकर अपनी व्यथा बताई। वह बहुत ही भले इंसान थे। उनके निर्देशन में चलाए जा रहे कालेज में नाम लिखवाया और वहीं से मुझे हाकी के गुर सीखने का मौका मिला। मां ने घर का काम काज संभालने के अलावा तेज बहादुर सिंह के यहां काम किया। मां के संघर्ष और घर की गरीबी को ध्यान में रखकर मैं हमेशा उनसे प्रेरणा लेती रही। मेहनत से पढ़ाई किया। ग्रेजुएशन की डिग्री ली। जूनियर हॉकी टूर्नामेंट में प्रदेश स्तर पर खेलते हुए नेशनल सीनियर वर्ग महिला में भी अपनी धाक जमाई। खेल कोटे से भारतीय रेलवे के वाणिज्य विभाग में चयनित होकर मां का अरमान पूरा किया। मेरा भाई ओम प्रकाश भी मेरे साथ मां के संघर्षों का ऋणी है। मातृ दिवस पर ऐसी मां को शत-शत बार प्रणाम।
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