गाजीपुर। मनरेगा में अब मजदूरों को मिलाकर लाखों का खेल किया जा रहा है। पांच दिन काम करने पर मजदूरों के खाते में बीस दिन की मजदूरी भेजी जा रही है। अधिक दिन की मजदूरी का पैसा मजदूरों से ले लिया जा रहा है। यह खुलासा कुछ मनरेगा मजदूरों ने किया है। मजदूरों का कहना है कि इस खेल में जिले के कई अधिकारी शामिल हैं।
वित्तीय वर्ष 2013-14 में मनरेगा से लगभग 48 करोड़ रुपये विकास के नाम पर खर्च किया जा चुके हैं। इस धनराशि से ज्यादातर कार्य मिट्टी के हुए हैं। कुछ जगहों पर खड़ंजा निर्माण के नाम पर धनराशि खर्च की गई है। शासन का निर्देश है कि मनरेगा में 40-60 का अनुपात हर हाल में पूरा होना चाहिए। बावजूद इसके ग्राम पंचायतें इस पर ध्यान नहीं दे रही हैं। देखा जाए तो मनरेगा की धनराशि ग्राम पंचायतें कागज में खर्च कर रही हैं। यह धनराशि मनरेगा मजदूरों के नाम से निकाली जा रही है। बिना काम किए मजदूरों को पैसा दे दिया जा रहा है। इसके बदले योजना की धनराशि मजदूरों के नाम से निकाल ली जा रही है। कासिमाबाद ब्लाक के कुछ मनरेगा मजदूरों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि हम लोग काम नहीं करते हैं इसके बाद भी योजना की धनराशि खाते में आ जाती है। इसके बाद प्रधान और रोजगार सेवक के साथ ही ग्राम पंचायत सचिव उस धनराशि को हमारे खाते से आहरित कराकर आपस में बांट लेते हैं। मजदूरों ने यह भी बताया कि गांव के किसी खड़ंजा पर मिट्टी का काम दो दिन का होेगा और रोजगार सेवक 15 दिन की हाजिरी लगा देते हैं। हम लोगों को पैसा सिर्फ दो दिन का मिलता है। शेष धनराशि प्रधान हम लोगों से मांग लेते हैं। साथ ही यह गोरखधंधा कई अन्य ब्लाकों में भी चल रहा है। सदर ब्लाक में भी यह गोरखधंधा धड़ल्ले से चल रहा है। इस पर विभाग की नजर नहीं है। मनरेगा से जुड़े जानकार सूत्रों का कहना है कि मनरेगा का अधिकांश हिस्सा मनरेगा कर्मियों के साथ ही ग्राम प्रधानों की जेब में जा रहा है। यदि ग्राम पंचायतों पर अंकुश नहीं लगा तो योजना का पलीता लगना तय है। उपायुक्त श्रम एवं रोजगार अनय मिश्रा ने बताया कि मनरेगा योजना में हो रहे खेल की जांच करने के लिए वह जल्द ही अपना रुख गांवों की तरफ करेंगे। साथ ही दोषी कर्मियों को दंडित भी किया जाएगा।
एपीओ और टीए की भूमिका पर उठ रहे सवाल
मनरेगा को आगे बढ़ाने के लिए शासन के निर्देश पर ब्लाकों पर तैनात किए गए एपीओ और ब्लाक और ग्राम पंचायत स्तर के टीए की भूमिका पर ही सवाल उठने लगे हैं। एपीओ की जिम्मेदारी है कि मनरेगा योजना से हुए कार्यों पर नजर रखकर अपनी रिपोर्ट बीडीओ के माध्यम से जिले के अधिकारियों को देना है। जबकि टीए का कार्य मनरेगा से हो रहे कार्यों की एमबी करना भुगतान की कार्रवाई सुनिश्चित कराना है। इस योजना में हो रहे खेल के लिए ये दोनों कर्मी पूरी तरह से दोषी हैं। सवाल यह उठता है कि अभी तक संविदा कर्मियों की जांच में एक भी कार्य गलत नहीं निकला। जबकि इसमें रोज गड़बड़ी हो रही है। इसकी जांच कराने पर बड़ा खुलासा हो सकता है।
मनरेगा में जहां भी गड़बड़ी हो रही है, उन ग्राम पंचायतों के विरुद्ध कार्रवाई की जाती है। योजना में मजदूरों की संख्या बढ़ाने की जांच की जाएगी। जांच में पुष्टि होने के बाद दोषी लोगों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। योजना में किसी भी प्रकार की लापरवाही नहीं होने दी जाएगी। रामअवतार सीडीओ