गाजीपुर। शहर तथा ग्रामीण क्षेत्रों में अक्षय नवमी का पर्व शनिवार को परंपरागत तरीके से मनाया गया। ऐसी मान्यता है कि इस दिन किया जाने वाला दान पुण्य कभी नष्ट नहीं होता। इस अवसर पर भगवान विष्णु के प्रतीकात्मक स्वरूप में आंवले के वृक्ष का विधि-विधान से पूजन अर्चन कर पंडितों को दान दिया गया। लोगों ने वृक्ष के पास ही भोजन बनाकर ग्रहण किया। कई स्थानों पर शुक्रवार को भी यह पर्व मनाया गया।
कार्तिक मास की नवमी तिथि को अक्षय नवमी के रुप में मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालुओं ने गंगा स्नान किया तथा आंवले के पेड़ की पूजा की। विधि-विधान से पूजन अर्चन करने के बाद हवन किया। पेड़ में पीला या लाल धागा बांधकर परिक्रमा की गई। शाम के समय आंवले के पेड़ों के पास लोगों ने पूड़ी, सब्जी, खीर आदि बना कर सपरिवार खाया।
मुहम्मदाबाद, जमानिया, जखनियां, सैदपुर, सेवराई, कासिमाबाद आदि तहसील क्षेत्रों में इस त्योहार को परंपरा के साथ मनाया गया। कार्तिक मास में सूर्योदय से पूर्व स्नान करने की भी मान्यता है। अधिकतर स्थानों पर इस परंपरा का भी निर्वहन किया जा रहा है जिसे कार्तिक स्नान कहते हैं। पूर्णिमा के दिन पूजा पाठ और दान पुण्य के बाद इसका समापन होता है। मुहम्मदाबाद निवासी पंडित मनीष तिवारी ने बताया कि हमारे सनातन धर्म में पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, आकाश, वायु आदि सभी चीजों को धर्म से जोड़ा गया है। आज के दिन किया गया दान पुण्य हमेशा अक्षय रहता है।
पुण्य का कभी क्षय नहीं होता
जखनिया। संतान प्राप्ति के लिए अक्षय नवमी पर पूजन-अर्चन का विशेष महत्व है। शनिवार को सिद्धपीठ हथियाराम मठ पर अक्षय नवमी मनाई गई। महामंडलेश्वर स्वामी भवानीनंदन यति ने कहा कि अक्षय नवमी पर मां लक्ष्मी ने पृथ्वी लोक में भगवान विष्णु एवं शिवजी की पूजा आंवले के रूप में की थी और इसी पेड़ के नीचे बैठकर भोजन ग्रहण किया था। मठ स्थित बावन बीघा बागीचे में वैदिक रीति रिवाज से पूजन-अर्चन कर भोजन प्रसाद ग्रहण किया गया। इस अवसर पर रत्नाकर त्रिपाठी, स्वामी सोमनाथ गिरी, स्वामी अभयानंद, श्रवण तिवारी, आचार्य शोभनाथ, राधेश्याम जायसवाल, चंद्रशेखर सिंह, अमिता दुबे, लौटू प्रजापति, शैलेंद्र सिंह, सचिदानंद सिंह, अभिषेक, वंदना सिंह आदि उपस्थित थे।