गंगा और सहायक नदियों में गिर रहा नाला तेजी से निर्मल जल को विषैला बनाता जा रहा है। नदी के घाट कूड़े और कचरे की ढेर से पटे पड़े हैं। जितनी तेजी से विकास और उद्योग स्थापित किए जा रहे और विकास का ढोल पिटा जा रहा है, उतनी ही तेजी से गंगा में गिर रहे इनके कचरे जल निर्मल पानी को तेजी से प्रदूषित कर रहे हैं।
नगर क्षेत्र में देखा जाए तो करीब एक दर्जन नाले का गंदा पानी गंगा में गिरते हैं। कमोवेश यही हाल इसकी सहायक नदियों का भी है। इनके किनारे बसे शहर और गांव के नालों का पानी बेधड़क गंगा के निर्मल जल में मिल रहा है। जो इसके प्रदूषण का मुख्य कारण बनता जा रहा है। यहीं नहीं, रोजाना 20 शव गंगा के किनारे जलाए जाते हैं और 5 से 7 शवों का रोज जल प्रवाह किया जाता है। अगर देखा जाए तो पिछले पांच वर्षों में प्रदूषण की स्थिति में काफी बदलाव आया है। इसका मुख्य कारण है कि गंगा के किनारे तेजी से बस रही आबादी जिससे गंगा सहित सहायक नदियों का पानी धीरे-धीरे प्रदूषित होता जा रहा है। नालों से गिरे रहे कचरों और गंदगी पर रोक लगाने के लिए जिला प्रशासन की ओर से कोई सार्थक कदम नहीं उठाया गया है। नदियों के घाटों के किनारे पटे कचरों के सड़ने से उठनी वाली दुर्गंध भी लोगों में विभिन्न रोगों का कारण बनती जा रही है। लाख अभियान के बाद भी गंगा का जल निर्मल होने की दशा में प्रदूषित होती जा रही है।