गाजीपुर। दीपावली को लेकर खुशियां चहुंओर हिलोर मार रही है। जनपदवासी दिवाली की तैयारी में जुट गए हैं। बाजार भी सजने-संवरने लगा है। लेकिन कुम्हार समाज अपने पुश्तैनी धंधे को लेकर उदास हैं। उन्हें आशंका है कि यदि हर वर्ष की तरह इस बार भी मिट्टी के दीयों की पूछ नहीं हुई तो लागत डूब जाएगी और पसीना भी व्यर्थ में चला जाएगा। बाजार में माटी के दीयों की दूकान लगाने वाले कुम्हार और उनकी घरों की महिलाओं में कुछ इस तरह की ही बेबसी दिखाई पड़ रही है। वजह प्लास्टिक के प्रचलन एवं चाइनीज दीयों के छा जाने के बाद माटी के दीयों और खिलौनों की डिमांड कम हो गई है। इसलिए कुम्हार मन मसोस कर अपना चाक चला रहे हैं।
एक जमाना वह भी था, जब कुम्हारों की ओर से चाक पर घड़ा या कुल्हड़ गढ़ते समय जैसे ही लोगों की नजरें उन पड़ती थीं, कुछ देर लोग कुम्हार की उंगलियों की हरकतों को निहारने लगते थे, लेकिन अब प्लास्टिक के वस्तुओं और चाइनीज दीयों के बढ़ते प्रचलन के चलते चाक की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है। नाममात्र के ही कुम्हार काफी परेशानियों के बीच मिट्टी की व्यवस्था कर मिट्टी का दीया, घड़ा, गुल्लक, कुल्हड़ आदि बना रहे हैं। प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियों के बाजार में आ जाने से अब मिट्टी के खिलौनों और मूर्ति बनाने से भी कुम्हार समाज के लोगों का मोह भंग होने लगा है। दो दशक पहले दीपावली के मौसम में कुम्हारों के चाक का यह आलम था कि सुबह से लेकर शाम तक यह पूरी रफ्तार से चलते थे, लेकिन प्लास्टिक के सामानों के बढ़ते प्रचलन की वजह से अब चाक की रफ्तार काफी धीमी पड़ गई है।
शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में नाममात्र के कुम्हार समाज के लोग इस धंधे को कर रहे हैं। मिट्टी से बने सामानों की मांग कम हो जाने और आसानी से मिट्टी न मिल पाने की वजह से इस धंधे से जुड़े लोगों का इससे मोह भंग होता जा रहा है। जो लोग इस धंधे से जुड़े हुए हैं, वह इस समय दीपावली और डाला छठ के मिट्टी का दिया और कुस बनाने में लगे हुए हैं। मोमबत्ती का प्रचलन बढ़ने की वजह से अब एक तरफ जहां मिट्टी के दीयों की मांग भी कम हो गई है, वहीं प्लास्टर आफ पेरिस की मूर्तियों के बाजार में छा जाने से मिट्टी के मूर्तियों की चमक भी फीकी पड़ गई है। इससे कुम्हार नाममात्र को ही मिट्टी का दीया बना रहे हैं।
छलक पड़ा कुम्हार का दर्द
गाजीपुर। शहर के बरबरहना निवासी कुम्हार शिवनारायण प्रजापति बताया कि कुम्हार समाज पर आज तक किसी भी सरकार की नजरें इनायत नहीं हुई हैं। इससे पुश्तैनी धंधा बंदी के कगार पर पहुंच गया है। प्लास्टिक के सामानों के बढ़ते प्रचलन और मिट्टी न मिल पाने की वजह से चाक की रफ्तार दिनोदिन धीमी पड़ती जा रही है। मिट्टी न मिलने पर और सामानों का सही दाम न मिलने से समाज के लोगों का इस धंधा से मोह भंग होता जा रहा है। कई दूसरा रोजगार कर रहे हैं। अगर यह समस्या आगे भी बनी रही तो यह कहना गलत नहीं होगा कि चाक रफ्तार पूरी तरह से थम जाएगी।