शादियाबाद। उम्र जब शरीर का साथ छोड़ने लगती है, तब भी आस्था का दीप कैसे प्रज्वलित रह सकता है, इसकी जीती-जागती मिसाल हैं जैतून निशा। शादियाबाद क्षेत्र के मसूदपुर गांव की 107 वर्षीय जैतून निशा पवित्र रमजान में पूरे महीने रोजा रखा और पांचों वक्त की नमाज अदा कर रही हैं। कड़कती धूप और बढ़ती उम्र की चुनौतियों के बावजूद उनकी दिनचर्या सामान्य बनी हुई है। सहरी से लेकर इफ्तार तक वह पूरी पाबंदी के साथ रोजा रखती हैं। उनकी यह अटूट आस्था पूरे इलाके में चर्चा का विषय बनी हुई है।
उनके पोते हाफिज बेलाल अहमद बताते हैं कि दादी न केवल रोजे रख रही हैं, बल्कि बिना किसी सहारे के अपने अधिकांश काम भी खुद ही कर लेती हैं। हालांकि घुटनों में दर्द के कारण चलने-फिरने में थोड़ी परेशानी होती है, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति के आगे यह तकलीफ भी छोटी पड़ जाती है।
जैतून निशा बताती हैं कि उन्हें रोजा रखने की प्रेरणा अपनी मां मदीना बेगम से 15 वर्ष की उम्र में मिली थी। तब से लेकर आज तक उन्होंने शायद ही कभी रोजा छोड़ा हो।
परिवार के बीच वह आज भी उतनी ही सक्रिय हैं। बच्चों और पोते-पोतियों के साथ बैठकर वह 100 साल पुरानी यादें बड़े फख्र से साझा करती हैं। अपने सभी नवासों, पोतों और प्रपौत्रों को नाम से पहचानती हैं और सब पर समान स्नेह लुटाती हैं।
हाफिज बेलाल अहमद के अनुसार, उनके पति अमीन अहमद का इंतकाल करीब 27 वर्ष पहले 80 वर्ष की उम्र में हो गया था।
तीन भाई-चार बहनों में सबसे बड़ी जैतून निशा के एक भाई और एक बहन आज भी जीवित हैं। 107 साल की उम्र में भी इबादत, रोजा और कुरान की तिलावत में लीन जैतून निशा आज की पीढ़ी के लिए न सिर्फ प्रेरणा हैं, बल्कि यह भी सिखाती हैं कि मजबूत इरादों के आगे उम्र महज एक संख्या है।