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ट्रांसपोर्टेशन चार्ज ने बढ़ाई कांच उत्पादों की लागत

Sun, 07 Jun 2015 11:44 PM IST
ब्यूरो,अमर उजाला फीरोजाबाद
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गेल इंडिया के फरमान से कांच उद्योग जगत में हलचल मच गई है। गेल इंडिया लि. द्वारा ट्रांसपोर्टेशन चार्ज वसूलने को नोटिस जारी किए गए हैं। इस आदेश से कांच उत्पादों की लागत में इजाफा होने से हर माह उद्यमियों पर लाखों रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है।  
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सुहागनगरी का कांच उद्योग तमाम मुसीबतों से जूझ रहा है। मंदी के मार के चलते कांच उद्योगों की हालत पूरी तरह खस्ता है। गर्मी के सीजन में कारखानों में आए दिन होने वाली हड़ताल, कार्य बंदी से उद्यमियों को मुश्किल हो रही है। वहीं गेल द्वारा आए दिन जारी किए जाने वाले फरमान उद्यमियों के गले की फांस बने हुए हैं। गेल इंडिया लि. द्वारा एक साल से लगातार उद्यमियों पर ट्रांसपोर्टेशन चार्ज बढ़ाने को दबाव बनाया जा रहा है। उस समय करीब 1.20 रुपये चार्ज बढ़ाने की बात सामने आई थी। बाद में उद्यमियों की पहल पर पेट्रोलियम मंत्रालय द्वारा राहत प्रदान की गई थी। इसके बाद गेल इंडिया लि. ने पुन: अप्रैल माह में सभी उद्यमियों को नोटिस जारी किए, जिसमें अप्रैल 2013 से 76 पैसे प्रति घनमीटर के हिसाब से ट्रांसपोर्टेशन चार्ज वसूलने की बात कही गई थी।

पेट्रोलियम मंत्रालय से चल रहा वार्ता का दौर
उद्यमियों द्वारा गेल इंडिया लि. द्वारा जारी फरमान को वापस कराने को अंदरखाने ठोस पहल की जा रही है। उद्यमियों की पेट्रोलियम मंत्रालय से लगातार वार्ता का दौर चल रहा है। दूसरी ओर, कुछ उद्यमी राहत पाने के लिए कोर्ट की शरण में पहुंच गए हैं। उद्यमियों का कहना है कि ट्रांसपोर्टेशन चार्ज वापस कराने को हर प्रयास किया जा रहा है।
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ट्रांसपोर्टेशन चार्ज से बढ़ गई कांच उत्पादों की लागत
गेल इंडिया लि. द्वारा 76 पैसे प्रति घनमीटर के हिसाब से ट्रांसपोर्टेशन चार्ज वसूलने के कारण कांच उत्पादों की लागत में इजाफा होने से हर रोज उद्यमियों को लाखों की चपत लग रही है। सुहागनगरी में करीब 190 इकाइयां गैस से संचालित हैं। इसमें करीब 125 इकाइयों में कांच की चूड़ी बनाई जाती है। प्रत्येक कारखाने में हर रोज तीन से साढ़े तीन हजार तक तोड़े बनते हैं। ट्रांसपोर्टेशन चार्ज के कारण प्रति तोड़े पर एक रुपये की वृद्धि हुई है। इसके बावजूद मार्केट में चूड़ी पुराने रेट पर बेची जा रही हैं। उद्यमी चाहकर भी चूड़ी की रेट नहीं बढ़ा पा रहे हैं। इसके सापेक्ष ग्लास कारखानों पर प्रति माह एक-दो करोड़ का बोझ पड़ रहा है।
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