जसराना। प्रत्येक वर्ष माघ माह में लगने वाला जखई मेला अपने पूरे जोरों पर है। शनिवार से मंदिर में भक्तों की भीड़ उमड़ने की उम्मीद है। श्रद्धालुओं की उमड़ने वाली भीड़ को देखते हुए एसडीएम एवं सीओ ने मंदिर परिसर का निरीक्षण कर वहां मौजूद मंदिर के व्यवस्थापकों एवं प्रबंधक से चर्चा की। इस दौरान पुलिस प्रशासन को चाक चौबंद व्यवस्थाएं करने के निर्देश दिए। सैकड़ों वर्षाें से जसराना के गांव पैढ़त में जखई महाराज के मेले का आयोजन किया जाता है। मंदिर में दर्शनों के लिए हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ उमडती है। शनिवार को दूसरी जात के मौके पर उमडने वाली भीड़ को देखते हुए एसडीएम जसराना सुरेंद्र सिंह, सीओ जसराना एवं स्थानीय पुलिस के साथ मंदिर परिसर में पहुंचे। जहां मौजूद प्रबंधक विवेक पालीवाल से पूरी जानकारी ली। एसडीएम ने सुरक्षा को लेकर बात करते हुए मंदिर परिसर में लगे सीसीटीवी कैमरे भी चेक किए। इस दौरान थानाध्यक्ष एका को वाहनों की पार्किंग की बेहतर व्यवस्था करने के साथ ही यात्रियों की सुविधा एवं सुरक्षा के लिए सभी कदम उठाने के लिए निर्देश दिए।
-माघ माह में लगने वाले जखई महाराज के मेले की शुरुआत हो चुकी है। आज दूसरे शनिवार को हजारों की संख्या में भीड़ आने की उम्मीद है। श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए व्यवस्थाएं की गई है। वहीं तीसरे शनिवार को मंदिर में एक लाख से अधिक श्रद्धालु पहुंचेंगेे।
-विवेक पालीवाल, मंदिर प्रबंधक, जखई महाराज
यहां से आते हैं श्रद्धालु
जसराना। पैढ़त में बने जखई महाराज के मंदिर पर प्रतिवर्ष माघ मास की पूर्णमासी से फागुन मास की पूर्णमासी तक मेला लगता है। इस अवधि में आने वाले प्रत्येक शनिवार एवं रविवार को जखई महाराज की जात होती है। जहां इटावा, औरेया, फर्रुखाबाद, कानपुर, शाहजहांपुर, मुरैना, भिंड, जालौन, उरई सहित बुंदेलखंड और पूर्वांचल के हजारों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। मंदिर परिसर में वे अपने बच्चों का मुंडन कराते हैं और जखई महाराज का दर्शन कर मनौती मांगते हैं।
मंदिर का इतिहास
स्थानीय लोगों का मानना है कि जखई महाराज पृथ्वीराज चौहान के सेनापति थे। पृथ्वीराज एक बार संयोगिता का हरण करके ला रहे थे। तभी रास्ते में जयचंद की सेना के साथ उनका युद्ध हो गया। लड़ते-लड़ते दोनों दलों की सेनाएं पैढ़त तक आ गईं। जहां पर दोनों पक्षों में युद्ध हुआ। युद्ध भूमि पर जयचंद की सेना ने पृथ्वीराज के सेनापति जखई का सिर काट दिया, लेकिन सिर कटने के बाद भी जखई महाराज के धड़ ने युद्ध करते हुए प्रेमी जोड़े की रक्षा की। जहां जखई महाराज का धड़ गिरा, वहीं उनके अनुयायियों ने मंदिर बनवाया।