पालिका से नगर निगम बनने के बाद भी चहेते ठेकेदार और कंपनियों को लाभ पहुंचाने का खेल जारी है। नगर निगम के अधिकारियों ने चहेती कंपनी को पांच साल के लिए यूनिक पोल का टेंडर दे दिया। वहीं अफसरों द्वारा निमयों को धता बताकर यूनिक पोल के टेंडर उठाने में भी मनमानी की गई।
पालिका बोर्ड में आय के स्रोत बढ़ाने को शहर में आगरा, मथुरा की तर्ज पर आधा दर्जन यूनिक पोल लगवाए गए थे। पालिका बोर्ड द्वारा प्रति पोल के हिसाब से काफी कीमत पर यूनिक पोल का मथुरा की कंपनी को 20 साल का टेंडर दिया गया था। जबकि मामले से टैक्स विभाग के मुख्य अफसर अछूते रहे। ऐसे में मामले की शिकायत उच्च स्तर पर पहुंची तो खुद की गर्दनें फंसती देख आनन-फानन में टेंडर निरस्त कर दिया गया। शासन द्वारा चार अगस्त 2014 को पालिका से नगर निगम बना दिया गया, इसके बाद भी वही पुरानी परंपरा बदस्तूर जारी है। नगर निगम द्वारा हाल ही में नए वित्तीय वर्ष के लिए यूनिक पोल का मथुरा की कंपनी को टेंडर जारी किया गया है। सूत्रों के अनुसार मथुरा की कंपनी ओम साई पब्लिसिटी को प्रति पोल 35 हजार के हिसाब से पांच साल के लिए टेंडर जारी किया गया है ,जो नियमानुसार गलत है। मथुरा की कंपनी को लाभ पहुंचाने के लिए अफसरों ने नियमों को ताक पर रखकर पांच के लिए टेंडर उठाया है।
टेंडर प्रक्रिया का प्रावधान
नगर निकायों में टेंडर उठाने का प्रावधान है कि किसी कंपनी अथवा ठेकेदार को एक वर्ष के लिए अपनी नियम-शर्तों पर टेंडर दिया जाता है। यदि कंपनी की सेवाएं संतोषजनक होती हैं तो टेंडर की कुल धनराशि का प्रतिशत बढ़ाते हुए प्रतिवर्ष उसे रिन्यूवल किया जा सकता है। शासनादेश में कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि किसी कंपनी को 5-10 अथवा 20 साल का टेंडर जारी कर दिया जाए।
गर्दन फंसती देख निरस्त किया गया था टेंडर
पालिका बोर्ड में टैक्स विभाग में तैनात लिपिक द्वारा मथुरा की कंपनी को फायदा पहुंचाने को मनमाने रूप से 20 साल का टेंडर जारी कर दिया गया था। खास बात यह रही कि इसमें टैक्स विभाग के कर अधीक्षक तक से फाइल पर हस्ताक्षर नहीं कराए गए। मामले में कई अफसरों की गर्दनें फसंती नजर आईं तो कंपनी का टेंडर निरस्त कराया गया। कंपनी आदेश के खिलाफ कोर्ट भी गई, लेकिन राहत नहीं मिली।
तो निगम को होता लाखों के राजस्व का फायदा
नगर निगम द्वारा यूनिक पोल का पांच साल के लिए टेंडर जारी किया गया। यदि यह टेंडर एक साल के लिए जारी किया जाता और अगले वर्ष दूसरी को कंपनी बढ़ाकर उठाया जाता तो नगर निगम को लाखों के राजस्व का फायदा होता।