फिरोजाबाद। सुप्रीम कोर्ट ने 103 ट्यूबवेल ऑपरेटरों की बर्खास्तगी के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 23 नवंबर 2016 के फैसले को बरकरार रखा है। हाईकोर्ट ने ट्यूबवेल ऑपरेटरों की बर्खास्तगी को अवैध करार दिया था और बर्खास्तगी की तिथि से लेकर आदेश जारी होने तक की तिथि तक ऑपरेटरों को उनकी मासिक तनख्वाह का 40 प्रतिशत भुगतान करने व उनको फिर से नौकरी पर रखने का आदेश दिया था। इस फैसले से नगर निगम फिरोजाबाद को झटका लगा है।
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने नगर निगम फिरोजाबाद के उप नगर आयुक्त द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई की और इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से साफ इनकार करते हुए नगर निगम की याचिका को खारिज दिया। इस ऐतिहासिक निर्णय से 103 ट्यूबवेल ऑपरेटरों में खुशी की लहर दौड़ गई। इस आदेश की पुष्टि श्रमिकों की ओर से पैरवी करने वाले एडवोकेट धर्मसिंह यादव ने की। उन्होंने कहा कि यह फैसला न्याय की जीत है और संघर्ष करने वाले कर्मचारियों के लिए बड़ी राहत है।
मामला 2000 के दशक का है। 103 ट्यूबवेल ऑपरेटरों को 21 माह का वेतन जारी नहीं किया गया था। कुछ ऑपरेटर छोड़कर चले गए और कुछ बिना तनख्वाह के काम करते रहे। इसके बाद 103 ट्यूबवेल ऑपरेटरों को बर्खास्त कर दिया था। इसके खिलाफ ऑपरेटरों ने कानूनी लड़ाई शुरू की। सबसे पहले पीड़ित ऑपरेटरों ने श्रम न्यायालय में वाद दायर किया, जहां उन्हें जीत मिली और उनकी सेवा समाप्ति को अवैध माना गया। इसके बाद नगर पालिका (जो अब नगर निगम है) ने इस फैसले को उच्च न्यायालय में चुनौती दी। उच्च न्यायालय ने भी श्रमिक पक्ष में ही निर्णय सुनाया। इस फैसले के खिलाफ नगर निगम फिरोजाबाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था।