कारखाने में मिक्सिंग का काम करने वाला मजदूर श्यामवीर 20 नवंबर को अपनी मां की तेहरवीं नहीं कर सका। जाटवपुरी निवासी काशिम का बेटा आगरा के एक निजी अस्पताल में भर्ती है, नई करेंसी न होने के कारण वह छुट्टी नहीं करा पा रहा है। राजस्थान के विभिन्न शहरों से कारखाने में कांच के टुकड़ेे एकत्रित करने का काम करने आयी महिलाएं काम न होने के कारण गांव वापसी की सोच रही हैं। मजदूर मंडी में तड़के चार बजे आने वाले तमाम श्रमिक काम न मिलने से परेशान हैं। नोटबंदी से मजदूर रोजी-रोटी को तरस रहे हैं।
नोटबंदी के असर का जायजा लेने पहुंची अमर उजाला टीम को औद्योगिक क्षेत्र में कारखाना संचालकों के साथ-साथ मजदूरों के चेहरे पर चिंता और तनाव देखने को मिला। यहां अधिकांश कारखानों में काम नहीं लगा है। एक चूड़ी कारखाने में काम चल रहा था। मिक्सिंग का काम करने वाले मजदूर श्यामवीर ने बताया कि नोटों के चक्कर में वह अपनी मां की तेहरवीं भी नहीं कर पाया है। 20 नवंबर को तेहरवीं थी। कोई पांच सौ का नोट नहीं ले रहा। सामान नहीं मिल रहा। अब बाद में तेहरवीं करूंगा। मिक्सिंग के काम के ठेकेदार शाकिर ने कहा कि अब तो दुकानदारों से उधार देना भी बंद कर दिया है। शाकिर से बात चल ही रही थी कि चूड़ी कारखाने में गर्म कांच के मुठ्ठे बनाने वाले मजदूर काशिम ने अपनी पीड़ा बताना शुरू कर दिया। उनका बेटा आसीम (12) आगरा के एक अस्पताल में आईसीयू में भर्ती है। दिमाग का आपरेशन हुआ है। डाक्टर ने पांच सौ रुपये के नोट नहीं लिये। पड़ोसियों से चंदा करके वह पैसे ले गए तब आपरेशन कराया। अब नई करेंसी हाथ में आए तब बेटे की छुट्टी कराएं।
रहना निवासी देवेंद्री कारखाने में भगार (कांच के टुकडे़) एकत्रित करती है। मजदूरी में पांच सौ का नोट चलता है। रसोई का सामान लेने जाओ तो दुकानदार से पांच सौ का नोट 400 रुपये में लेता है तब सामान देता है। पेट तो भरना है मजबूरी में पांच सौ रुपये का नोट चार सौ रुपये में चलाने को मजबूर हैं।
तड़के चार बजे आए फिर भी नहीं मिला काम
फीरोजाबाद। दोपहर के 12 बज चुके थे लेकिन मोहम्मद शफीक, मुन्ना लाल और शम्मी को काम नहीं मिला था। औद्योगिक क्षेत्र में बंद कारखानों की ओर इशारा करते हुए इन मजदूरों ने कहा कि तड़के चार बजे घर से आ गए थे लेकिन काम का अभी तक कोई ठीया नहीं। कारखाने बंद हैं काम कहां से मिले। अबै तो सौदा उधार लै के बच्चों कौ पेट भर रहे हैं..। गरीब आदमी को भूखो मरवौ है।
नमक से सूखी रोटी खाने की बेबसी
फीरोजाबाद। औद्योगिक क्षेत्र में एक कारखाने के बाहर भगार (कांच के टुकड़े) के ढेर पर काम कर रही महिलाओं के चेहरे पर नोटबंदी से हुई परेशानी साफ दिखाई दे रही थी। ये महिलाएं मूल रुप से राजस्थान के भरतपुर और अलवर क्षेत्र की रहने वाली हैं। पूरे परिवार के साथ किराए पर मकान लेकर यहां रह रही हैं। सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक काम करती हैं तब डेढ़ सौ या दो सौ रुपये मिल पाते हैं। राजेश्वरी और ओमवती ने कहा कि अबै तो काम कर रहे हैं शाम कू पतौ चलेगी कि मजदूरी का मिलत है..अबै काम मिल गयौ जैई बौत है। नमक के साथ सूखी रोटी लेकर आयी महिला ने कहा कि देखौ सब्जी तक कूं पैसा नाए। नमक है मूली और लै लई है ताई से जै सूखी रोटी खाए लेंगे। कारखाने के सेठ अऊ का करैं बिन पे ऊं तो खुले पइसा नाएं।
दुकानों से उधार कब तक लें सामान
एक कारखाने में एकत्रित मजदूरों ने कहा कि ठेकेदार मजदूरी में पांच सौ का नोट दे रहा है। दुकानदार इसे नहीं ले रहे। बैंक की लाइन में लगें तो मजदूरी मारी जाती है। होराम सिंह, विजेंद्र और अवनीश ने कहा कि अभी तो दुकानदार से उधार सामान ले रहे हैं लेकिन दुकानदार भी उधार कब तक देगा।