फिरोजाबाद के दो युवाओं ने बहुराष्ट्रीय कंपनी में नौकरी छोड़ स्टार्टअप शुरू किया है। यह युवा लाखों रुपये के पैकेज को छोड़कर खेती किसानी में हाथ अजमा रहे हैं। पहले उन्होंने खेतीबाड़ी में रासायनिक खाद का इस्तेमाल किया, लेकिन रासायनिक खाद से फैलने वाली बीमारियों को लेकर वह चिंतित हो गए। इसके बाद उन्होंने जैविक खाद बनना शुरू किया। एक दो फसल बाद उन्होंने इसका लाभ दिखा। अब जैविक खाद बनाकर बेच रहे हैं, कई किसानों को भी अपने साथ जोड़ा है।
एक साथ की थी पढ़ाई
तिलक नगर निवसी विशाल और श्रीनगर निवासी मुकुल की दोस्ती को 25 साल से अधिक हो गए। दोनों ने एक साथ पढ़ाई की। एमबीए पास युवा कोरोना काल में एमएनसी कंपनी में काम करते थे, लेकिन कंपनी ने कोरोना काल में वर्क फ्रॉम होम कर दिया। फुरसत के समय में उन्होंने यू ट्यूब पर जैविक खाद बनाने का एक वीडियो देखा। उस वीडियो को देखकर उनके मन में भी ख्याल आया। इसके बाद उन्होंने पहले खेती पर हाथ अजमाया। खेती पर उस तरह का लाभ नहीं मिलने व फसलों के उत्पादन भी मन मुताबिक न होने के कारण उन्होंने खेत के कुछ हिस्सों में जैविक खाद बनाना शुरू कर दिया।
पहले थोड़ा मुश्किल लगा
उन्होंने 1500 फीट में गोबर संग्रह कर आइसीनिया फैटीडा प्रजाति के एक किलो केंचुए को डाल दिए। दो साल में आज इन केंचुए की संख्या 60 किलो हो गई है। मुकुल ने बताया कि जैविक खाद बनाने का आइडिया को जमीन पर उतारना पहले थोड़ा मुश्किल लगा, लेकिन काम करने के बाद सब कुछ आसान हो गया। जैविक खाद की कमी व डीएपी की महंगी दरें होने के कारण कई किसान अब जागरूक हो रहे हैं। डीएपी करीब 27 रुपये प्रतिकिलो की दर से उपलब्ध होती है। जबकि यह जैविक खाद महज साढ़े पांच से छह रुपये प्रतिकिलो में उपलब्ध हो जाती है।
ऐसे तैयार करते हैं खाद
गोबर को हिस्सों में बांटकर उसके बेड बनाते हैं। इस पर नर मादा केंचुआ को छोड़ा जाता है। ऊपर से टाट के बोरे या फिर पराली बिछा दी जाती है। कम से कम 60 से 70 दिनों तक सुबह व शाम को पानी का छिड़काव किया जाता है। इसके बाद परतों के हिसाब से खाद को निकाला जाता है। इसमें केंचुओं की संख्या में खुद ही बढ़ती रहती है।
जैविक खाद से कम होती बीमारी
जैविक खाद बनाने वाले विशाल ने बताया कि जैविक खाद फसलों के लिए बेहद लाभदायक है। इससे उगे अनाज से बीमारियां कम होती है। उपजाऊ भूमि बंजर भी नहीं होती। जबकि डीएपी व अन्य रासायनिक खाद का इस्तेमाल करने से वह पोषक तत्व फसल में नहीं मिल पाते है।