सेहत के लिए हानिकारक साबित हुई मैगी को देश भर में प्रतिबंधित कर दिया गया है। इसके बावजूद अन्य मिलावटी खाद्य पदार्थों पर प्रशासन की नजर नहीं है। शहर में खुले स्थानों पर बिकने वाले साठ फीसदी से अधिक खाद्य पदार्थ मिलावटी हैं। वहीं चालीस फीसदी गुणवत्ता से दूर। इन पर लगाम कसने के लिए अथवा रोकने के लिए सरकार के पास कोई ठोस नीति है और न ही कानून। कई खाद्य चीजों में तो हानिकारक केमिकल मिलाया जाता है। इनमें दूध, खाद्य तेल, दाल और सब्जियां शामिल हैं।
बताते चलें कि नूडल्स को लेकर नेस्ले कंपनी पर सख्त कार्रवाई की गई लेकिन इससे इतर प्रशासन की नाक के नीचे खुलेआम मिलावटी पदार्थ बिक रहे हैं। खाद्य पदार्थ को लेकर इंडस्ट्री चेंबर एसोचैम के सर्वे में यह बात सामने आई कि 60 से 65 फीसदी खुले खाने-पीने के तेल में बड़े पैमाने पर मिलावट होती है। जिला खाद्य विभाग की मानें तो विगत दिनों जांच के लिए गए दाल और सब्जियों के सैंपल में आर्सेनिक मिला था। यह एक ऐसा कैमिकल है, जिससे कैंसर भी हो सकता है। वहीं यूपी में हुई एक जांच में सैंपल के 28 फीसदी अंडों में ई-कोलाई बैक्टीरिया पाया गया था। इससे पेट में इंफेक्शन हो जाता है। दूध भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। दूध में कई बार अडल्ट्रेशन की शिकायत सामने आई है। जिले से गए दूध सैंपल में 69 फीसदी दूध के सैंपल मानकों के हिसाब से सुरक्षित नहीं थे। नूडल्स की बात करें तो नेस्ले मैगी के अलावा अन्य कंपनियों के नूडल्स भी बाजार में बिक रहे हैं। इन पर अब तक उपभोक्ताओं की नजर कम इनायत थी लेकिन अब उनकी बिक्री भी होने लगी है।
वरिष्ठ चिकित्सक डा. आरके पांडे का कहना है कि दाल, सब्जियां व फलों में इस तरह के कैमिकल मिलाए जाते हैं, जो शरीर के लिए घातक हैं। जंक फूड में कैलोरी की मात्रा अधिक होने से फैट भी बढ़ता है, दूरगामी दुष्परिणाम होते हैं।
एक प्रशासनिक अधिकारी की मानें तो सरकार के पास ऐसी कोई मशीनरी नहीं हैं। जिससे इसकी जांच हो। वस्तुएं सीधे तौर रिटेल मार्केट में पहुंचाई जाती हैं अथवा रिटेल मार्केट में उसको भेजा जाता है।
कानूनविदें की राय
अधिवक्ता दलबीर सिंह का कहना है कि उपभोक्ता सुरक्षा कानून, 1986 के सेक्शन 12(डी) के अनुसार केंद्र या राज्य सरकार राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निपटारा आयोग (एनसीआरडीसी) में व्यक्तिगत क्षमता में या उपभोक्ता हित के प्रतिनिधि के रूप में शिकायत दर्ज करा सकती हैं। हालांकि अब तक इस सेक्शन के तहत कोई भी मामला दर्ज नहीं किया गया है। यदि मंत्रालय अगर ऐसा करता है तो इस तरह का यह पहला मामला होगा। हर्जाने की राशि फोरम तय करेगा।
अधिवक्ता लियाकत अली की मानें तो उपभोक्ता सुरक्षा नियम के सेक्शन 10 (ए) के अनुसार प्रभावित उपभोक्ताओं की पहचान नहीं की जा सकती है। हर्जाने की राशि को उपभोक्ता कल्याण फंड में क्रेडिट किया जाएगा। इस फंड का उपयोग उपभोक्ताओं के कल्याण के लिए किया जाएगा और शिकायतकर्ता या शिकायतकर्ताओं के समूह द्वारा कानूनी कार्यवाही में जितना खर्च हुआ है, उसकी भरपाई के लिए भी फंड का इस्तेमाल किया जा सकता है।