विजेंद्र सिंह को सलामी देते जवान।
‘मुझे घेर लिया है। समझ में नहीं आ रहा क्या करूं।’ यह बात बीएसएफ के प्लाटून कमांडर विजेंद्र सिंह यादव ने 28 की सुबह बेटे रमाकांत से फोन पर कही थी। इसी तरह की बात विजेंद्र सिंह की पत्नी गुड्डी देवी ने भी कही।
विजेंद्र के बेटे रमाकांत का दावा है कि की मौत से संबंधित पूरी फाइल गुवाहाटी से बीएसएफ के एएसआई महानंद शर्मा लेकर आए थे। सुबह 11 बजे तय हो गया अब अंतिम संस्कार कर दिया जाए लेकिन घर वाले तैयार नहीं हुए। विजेंद्र सिंह यादव के एक रिश्तेदार राघवेंद्र यादव गांव पहुंचे। जिला और पुलिस प्रशासन के अधिकारियों के साथ सपा एमएलसी डा. दिलीप यादव, जिलाध्यक्ष रामसेवक यादव और डा. संजय यादव बातचीत कर ही रहे थे। उन्होंने गोली कैसे लगी...पोस्टमार्टम रिपोर्ट क्या है...आदि तमाम सवाल करते हुए शव को परिवारीजनों को साथ ले जाकर उलट-पलट कर देखा। गम के साथ गुस्सा तब फूट पडा जब गांव वाले मौत की गुत्थी सुलझाने की मांग करते हुए नारेबाजी करने लगे। गांव में खेत से सटी रेलवे लाइन को जाम करने तक बात पहुंच गई। रात भर सफर कर गांव पहुंचे थके हारे बीएसएफ के जवान स्थिति देख एक तरफ बैठ गए। बीएसएफ मुख्यालय से तमाम सवाल खड़े करने वाले मृतक के रिश्तेदार की बात कराई गई। बातचीत के दौरान कुछ तथ्य ऐसे बताए गए जिनको जान कर परिवारीजनों और गांव वालों का गुस्सा शांत हुआ। परिवारीजनों को विश्वास दिलाया गया कि उन्हें वह सभी हक दिए जाएंगे जो एक सेना के जवान की मौत के बाद परिवार को मिलने चाहिए। इस तरह गुस्सा शांत हुआ। 28 मई की सुबह से 30 मई की दोपहर तक पचास घंटे से अधिक पूरा जलोपुरा गांव शोक और गम के साथ शंकाओं से घिरा रहा।
जलोपुरा के कई युवा सेना में
जलोपुरा गांव के कई युवक सेना में सेवाएं दे रहे हैं। विजेंद्र सिंह यादव के परिवार के ही पांच लोग सेना में हैं। विजेंद्र सिंह के भतीजे रमेश यादव की पोस्टिंग भी गुवाहटी में ही है। गांव के दो अन्य युवक भी गुवाहटी में ही तैनात हैं। विजेंद्र सिंह की मौत की सबसे पहले खबर उनके भतीजे रमेश पर ही आयी थी। रमेश 98 वटालियन में हेड क्लर्क हैं। शव को जलोपुरा लेकर वह बीएसएफ के जवानों के साथ आए हैं। उन्होंने पूरा बाक्या ग्रामीणों को समझाया जानकारी दी। काफी समय पूर्व नरेंद्र के सेना में तैनात भाई नरेश की डाबरा सिंध नदी में डूबने से मौत हो गई थी।
मिलनसार और सरल स्वभाव के थे विजेंद्र
गांव वालों ने बताया कि विजेंद्र सिंह यादव जब भी गांव आते थे लोगों से घुलमिल कर मिलते थे। फरवरी माह में ही बेटे की शादी में वह गांव आए थे। ग्रामीणों ने बताया विजेंद्र का बचपन गांव में ही बीता। वह गांव में बचपन में नाटक किया करते थे।