परिवार नियोजन को बढ़ावा देने के लिए नसबंदी कराने वाले 2937 लाभार्थी एक साल से अधिक समय बाद भी प्रोत्साहन राशि का इंतजार कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि बजट नहीं मिलने के कारण भुगतान रुका है, जबकि जिले में महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक संख्या में नसबंदी कराई है।
छोटा परिवार-सुखी परिवार का सरकारी नारा सुनकर जिन 2937 लोगों ने जिम्मेदारी निभाई, अब वे खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। वजह यह है कि परिवार नियोजन को बढ़ावा देने वाली सरकारी प्रोत्साहन राशि अब विभागीय फाइलों और बजट के टोटे में उलझकर रह गई है। जिले के 2937 लाभार्थियों को ऑपरेशन थियेटर से बाहर निकले एक साल से ज्यादा का समय बीत चुका है, लेकिन उनके बैंक खातों में प्रोत्साहन राशि की एक भी किश्त नहीं पहुंची है।
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नियमानुसार, महिलाओं को 2000 रुपये और पुरुषों को 3000 रुपये की प्रोत्साहन राशि देने का प्रावधान है। यदि सभी 2937 लाभार्थियों के कुल बजट का गणित लगाएं तो यह राशि लाखों में बैठती है, जिसे देने में स्वास्थ्य विभाग ने अब पूरी तरह चुप्पी साध ली है। लाभार्थियों का आरोप है कि ऑपरेशन के वक्त तो बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन अब विभाग के चक्कर काटने पर सिर्फ ''बजट नहीं है'' का बोर्ड दिखा दिया जाता है।
पुरुष पीछे, नसबंदी कराने में महिलाएं आगे
बीते वित्तीय वर्ष अप्रैल 2025 से मार्च 2026 के आंकड़ों में दिलचस्प सामाजिक पहलू सामने आता है। जिले में नसबंदी कराने वालों में पुरुषों की भागीदारी बहुत कम है। बीते वित्तीय वर्ष में जिले में कुल 2932 महिलाओं ने आगे बढ़कर नसबंदी कराई, जो कुल आंकड़ों का लगभग शत-प्रतिशत है। अकेले शहरी क्षेत्र में 749 महिलाओं ने नसबंदी अपनाई, जो पूरे जिले में किसी भी ब्लॉक से सबसे ज्यादा है। वहीं, इसी अवधि में पूरे जिले में केवल 5 पुरुषों ने ही नसबंदी कराने की हिम्मत दिखाई। एसीएमओ डा. पवन कुमार ने बताया कि बीते वित्तीय वर्ष में इस मद में शासन स्तर से कोई बजट प्राप्त नहीं हुआ था, जिसके चलते भुगतान लंबित है। जैसे ही शासन से बजट जारी होगा, सभी 2937 लाभार्थियों के बैंक खातों में प्रोत्साहन राशि सीधे ट्रांसफर कर दी जाएगी।