घंटाघर के पास प्राचीन श्रीराम चंद्र जी महाराज मंदिर
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फिरोजाबाद। रामलीला के ऐतिहासिक महोत्सव से फिरोजाबाद के प्राचीन श्रीरामचंद्र जी मंदिर का इतिहास भी जुड़ा है। यह मंदिर चार सौ वर्ष से भी अधिक प्राचीन है। शहर के सदर बाजार स्थित श्रीरामचंद्र जी महाराज मंदिर पर ही भरत मिलाप की लीला का भव्य मंचन होता है। हजारों लोग इस लीला को देखने के लिए सदर बाजार में एकत्रित होते हैं। शहर में भगवान राम का यह एक मात्र मंदिर है। कई चमत्कार इस मंदिर से जुड़े हुए हैं। रामनवमी पर यहां बड़ा आयोजन होता है।
भगवान राम के इस मंदिर की स्थापना का इतिहास काफी रोचक है। मुगल शासन में जब अयोध्या में मंदिरों पर हमले किए गए और मंदिरों को तहस-नहस किया गया तब भगवान राम और माता जानकी की अष्ट धातु की प्रतिमाएं लेकर पंडित आसाराम के पूर्वज छिपते हुए जंगलों के रास्ते यहां आए थे। उस समय चंद्रवाड़ मुख्य शहर था और यहां जंगल थे। मूर्तियों को लेकर यहां जंगल में रात बिताने के बाद आगे का रास्ता तय करने के लिए अयोध्या से आए लोगों ने जब भगवान राम और माता जानकी की मूर्तियों को उठाया तो मूर्तियां उठी नहीं थी।
मंदिर श्री रामचंद्रजी महाराज के महंत पंडित रामकुमार शर्मा बताते हैं कि मूर्तियां जब नहीं उठी तो इन मूर्तियों को उस समय यहीं जंगल में स्थापित कर पूजा अर्चना शुरू कर दी गई। अयोध्या नगरी से आए लोगों ने यहीं मठ बना लिया था। इसके बाद यहां मंदिर बन गया। चार सौ वर्ष से यह मंदिर यथा स्थान पर बना हुआ है। रामलीला मंचन के दौरान यहां राम-भरत मिलाप की लीला का मंचन तब से हो रहा है जब से रामलीला महोत्सव शुरू हुआ है।
फिरोजाबाद। अयोध्या से भगवान राम और माता जानकी की मूर्तियां लाने वालों की सातवीं पीढ़ी से जुडे़ पंडित रामकुमार शर्मा इस मंदिर की देखरेख कर रहे हैं। इस मंदिर से कई रोचक तथ्य जुडे़ हैं। पंडित रामकुमार शर्मा बताते हैं कि क्षत्रपति शिवाजी को छुड़ा कर जब उनकी सेना आगरा किले से निकली थी तब शिवाजी महाराज ने रात को इसी जंगल में शरण ली थी जहां भगवान राम की मूर्ति स्थापित थी।
बाद में हिंदू साम्राज्य की स्थापना के दौरान क्षत्रपति शिवाजी ने ग्वालियर के महाराजा सिंधिया को इस मंदिर (तब मठ) की जानकारी दी थी। महाराजा सिंधिया तब इस मूर्ति के दर्शन करने आए थे। भगवान राम की इस मूर्ति को सिद्ध मूर्ति मानते हुए महाराजा सिंधिया ने भगवान रामचंद्र जी के नाम 52 बीघा जमीन कर दी थी। यह जमीन आज भी रामचंद्र जी के नाम है।