छदामीलाल जैन मंदिर में मुनि विनम्र सागर महाराज ने कहा कि क्रोध जीवन के लिए आग है। अंदरूनी जहर है। क्रोध माचिस की तीली की तरह है, जो स्वयं पहले जलती है और बाद में दूसरे को जलाती है। क्रोधी की आग में जलता व्यक्ति तन, मन और ज्ञान की शक्ति नष्ट कर लेता है। यही कारण है कि क्षमा करने वाले लोग ज्ञानी और ताकतवर होते हैं।
आचार्यश्री ने कहा कि क्षमा भाव ठंडे लोहे के समान और क्रोध गर्म लोहे के समान है। ठंडा लोहा हमेशा गर्म लोहे को पीटता है। उन्होंने कहा कि अहंकार और क्रोध सगे भाई है। क्रोध पुरुष की तरह है और क्षमा भाव सहनशील स्त्री की तरह। पुरुष-स्त्री की लड़ाई में पुरुष हारता है। मानसिक रूप स्त्री विजयी होती है। आचार्यश्री ने कहा कि क्रोध कमजोर है और क्षमा शक्तिशाली। क्रोध का निराकरण क्रोध नहीं है। क्रोध को क्षमा से ही नष्ट किया जा सकता है। क्षमा स्वयं संवेदन ज्ञान से अपने अंदर में प्रकट होती है। क्रोध एक छोटे से बिंदु से प्रारंभ होता है। क्रोध में 47 मांसपेशियों की शक्ति नष्ट होती हैं। कवहीं क्षमा में 19 पेशियों की शक्ति नष्ट होती है। क्रोध को क्षमा रूपी जल से शांत किया जा सकता है। हमें क्रोध से बचना चाहिए।